
भूमि को धीरे-धीरे होश आ जाता है। उसे होश में आया देख आकाश को एक सुकून महसूस होता है। ऐसा लग रहा था, भूमि की बंद आंखें उसकी जान निकाल रही थी। लेकिन जब उसने भूमि के फड़फड़ाती हुए पलके देखी तो उसने एक राहत की सांस ली।
भूमि धीरे-धीरे होश में आती है और आकाश को देखने लगती है। वह धीरे से उठ कर बैठने लगती हैं। आकाश जल्दी से उसके पीठ के पीछे तकिया लगा देता है । भूमि टिक कर बैठ जाती है । और अपनी बड़ी-बड़ी पलकों से आकाश को देखती हैं । आकाश उसे घूर कर देखते हुए कहता है, “ अब क्या आंखों से ही खाने का इरादा है ?”


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