
बाहर लगभग शादी की सारी तैयारियां हो गई थी। मंदिर के पुरोहित जी, जो कि शादी करवाने वाले थे वह भी मंडप पर आकर बैठ गए थे। उन्होंने सारी चीजों को सही से एक क्रम में लगाते हुए आस्तिक को देखकर कहा, “ राजा साहब यहां की सारी व्यवस्था हो चुकी है। अब आप वर वधु को मंडप पर बैठने के लिए कहिए। ताकि मैं विवाह की विधियां शुरू कर सकूं।”
आस्तिक मुस्कुराते हुए हा में सर हीलाता है और अमृता की तरफ देखता है। अमृता धीरे से भूमि को उठाती है और उसे मंडप की तरफ लाने लगती है।


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