
रात के वक्त
कीर्ति कमरे की बालकनी में खड़ी थी और कुछ सोच रही थी तभी रजत कीर्ति को पीछे से अपनी बाहों में भर लेता है। कीर्ति एक पल के लिए चौक जाती है और रजत से दूर चली जाती है। वो हैरानी से रजत को देखती है। उसके चेहरे पर घबराहट आ गई थी। रजत जब कीर्ति को ऐसे देखता है तो कहता है… “क्या हुआ कीर्ति तुम डर क्यों गई? ये मैं हूं!”


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