
अरुणिमा इस समय अपने कमरे में थी। वो बस बेचैनी से बालकनी की खिड़की से बाहर जाते हुए देख रही थी, जहां से रजत और मिश्री जा रहे थे..
तभी दरवाजा खुलता है और आस्तिक अंदर आता है.. अरुणिमा रोते हुए आस्तिक के सामने आती है और अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहती है... “राजा साहब इतने बुरे भी मत बनिए, मेरी मां अस्पताल में है। मुझे उनके पास जाने दीजिए. वादा करती हूं आप जो कहेंगे मैं वो करूंगी, मैं सारी जिंदगी आपके हाथों की कठपुतली बन कर रहूंगी बस मुझे मेरी मां के पास जाने दीजिए.. उन्हें इस वक्त मेरी जरूरत है।”


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