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वह मॉन्स्टर है पर तुम नहीं हो

मानेसर......

पृथ्वी और जानवी जिन लोगों के साथ थे, वे लोग कुलदेवी के मंदिर में दर्शन करने गए थे। पृथ्वी और जानवी भी उनके साथ गए हुए थे।

पृथ्वी की नजरें बार-बार जानवी पर जा रही थीं, क्योंकि जानवी ने उस दिन साड़ी पहनी थी। यह साड़ी उसे दादी जी ने दी थी। मंदिर जाने के लिए सारी औरतें साड़ी ही पहन रही थीं और सारे आदमी कुर्ता-पजामा। पृथ्वी के पास कुर्ता-पजामा नहीं था, इसलिए उसके लिए भी यह अरेंज करवाया गया था।

मंदिर पहुंचकर सारी जोड़ियां एक-एक करके कुलदेवी के दर्शन करने के लिए मंदिर में जा रही थीं। सबसे पहले दादाजी और दादी जी, जिनकी शादी की 75वीं सालगिरह थी। उनके नाम पर एक छोटी सी पूजा करवाई गई और उसके बाद वे दोनों कुलदेवी के मंदिर दर्शन करने गए। उसके बाद उनके बहू-बेटे और बाकी सारे रिश्तेदार एक-एक करके कुलदेवी के मंदिर जाने लगे। पर सबसे आखिर में जानवी और पृथ्वी बचे थे।

दादी जी की बहू जानवी के पास आई और बोली, "जानवी, अब बस तुम और पृथ्वी ही रह गए हो दर्शन करने के लिए। जाओ, तुम दोनों भी जाकर दर्शन कर लो। उसके बाद हम लोग यहां से निकलते हैं और फिर तुम लोगों को जहां जाना है, तुम जा सकते हो। तुम लोगों के लिए गाड़ी पहले से ही तैयार खड़ी है।"

जानवी मुस्कुराते हुए हां में सिर हिलाया। पृथ्वी और जानवी अपनी जगह से खड़े हुए और मंदिर की तरफ बढ़ गए कुलदेवी के दर्शन करने के लिए। लेकिन तभी वहां पर मंदिर परिसर के कुछ लोग आए और पृथ्वी और जानवी को रोकते हुए कहा, "रुक जाइए! आप लोग मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं।"

पृथ्वी और जानवी दोनों हैरानी से उन लोगों को देखते रह गए। तभी वहां पर दादाजी और दादी जी आए और उनका परिवार भी आ गया।

दादाजी ने कहा, "क्या बात है, महंत जी? आप बच्चों को दर्शन के लिए क्यों नहीं जाने दे रहे हैं? अरे, ये हमारे मेहमान हैं और सिर्फ हमारे कहने पर ही कुलदेवी के दर्शन के लिए आए हैं।"

मंदिर के महंत ने कहा, "देखिए, हम आपकी बहुत इज्जत करते हैं, क्योंकि आपका पूरा परिवार हर साल यहां पर कुलदेवी के दर्शन के लिए आता है। लेकिन यह बात तो आप लोग भी जानते हैं ना कि इस मंदिर में केवल विवाहित जोड़े ही जा सकते हैं।"

तभी दादी जी कहती हैं, "अरे, तो यह दोनों भी तो पति-पत्नी हैं और यह नियम तो हम भी जानते हैं! आपको क्या लगा, हम यूं ही किसी को भी कुलदेवी के दर्शन के लिए भेज देंगे? यह दोनों पति-पत्नी हैं, इसीलिए तो एक साथ दर्शन के लिए जा रहे हैं।"

मंदिर के महंत ने जानवी और पृथ्वी को देखते हुए कहा, "यह दोनों पति-पत्नी हैं? लेकिन लगता तो है नहीं! लड़की ने ना तो अपनी मांग में सिंदूर लगाया हुआ है और ना ही गले में मंगलसूत्र पहना हुआ है! हाथों में चूड़ियां तक नहीं हैं। सुहाग की एक निशानी नहीं है और आप कह रही हैं यह पति-पत्नी है?"

महंत की बात पर सब लोग हैरान हो गए और जानवी और पृथ्वी भी हैरान रह गए। क्योंकि जानवी ने भले ही झूठ कह दिया था, पर उसने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि कोई यह बात भी नोटिस कर सकता है।

अब जाकर सारा परिवार जानवी को देखने लगा। दादी जानवी को देखते हुए बोलीं, "यह क्या है जानवी? मैंने देखा है, जब से तुम हमारे साथ हो, तुमने कभी भी अपनी मांग में सिंदूर नहीं लगाया है। माना कि ज़माना बदल गया है, आजकल के बच्चे यह सिंदूर और मंगलसूत्र को ओल्ड फैशन कहते हैं, लेकिन सच बात तो यह है कि यह सब चीज़ें कभी ओल्ड फैशन नहीं होतीं! बल्कि यह सब चीज़ें तो एक सुहागन औरत का श्रृंगार होती हैं। और इसे लगाना हमेशा से यह साबित करता है कि वह अपने पति से कितना प्यार करती है।"

जानवी घबराई हुई नज़रों से पृथ्वी को देखती है, तो पृथ्वी भी हैरान नज़रों से जानवी को देखता है। उनका एक झूठ आज उन्हीं पर भारी पड़ गया था।

जानवी घबराते हुए दादी को देखते हुए कहती है, "दादी! वह मैं लगाना भूल गई थी। कोई बात नहीं, अगर हमें दर्शन के लिए नहीं जाने दिया जा रहा है तो हम यहीं बाहर से ही हाथ जोड़ लेंगे।"

तभी दादी की बहू अपना पर्स खोलते हुए कहती है, "यहीं से क्यों हाथ जोड़ोगी? अरे, बहुत नसीब वालों को मिलते हैं कुलदेवी के दर्शन और कुलदेवी सिर्फ शादीशुदा जोड़ों को ही दर्शन देती हैं, ताकि उनकी जोड़ी सलामत रहे।

मैं अपने साथ सिंदूर लेकर आई हूं। पृथ्वी, चलो जल्दी से जानवी की मांग में सिंदूर भर दो।"

पृथ्वी और जानवी दोनों की आँखें हैरानी से बड़ी हो गईं, और मुंह खुला का खुला रह गया।

पृथ्वी सकपकाते हुए कहता है, "आंटी, मैं कैसे! मतलब, अभी ऐसे..."

पृथ्वी से तो बोला भी नहीं जा रहा था और जानवी, उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उसका एक छोटा सा झूठ उसे यहां तक ले आएगा।

जानवी जल्दी से कहती है, "आंटी, मैं खुद कर लेती हूं ना! आप इन्हें क्यों कह रही हैं। मैं खुद ही अपनी मांग में सिंदूर लगा लेती हूं।"

लेकिन तभी महंत ने कहा, "नहीं बेटा! अगर आप लोग कुलदेवी के मंदिर में हैं और इस मंदिर में अगर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भरता है, तो ऐसे में उन दोनों का रिश्ता और मजबूत होता है! और कुलदेवी का आशीर्वाद उन दोनों के ऊपर रहता है। तुम्हारा सुहाग दीर्घायु होगा। अपने पति को ही अपनी मांग में सिंदूर लगाने दो।"

पृथ्वी और जानवी को समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वे इस हालात से कैसे निकलें? इतने सारे लोग उनके आसपास थे और सबका दबाव उन दोनों के ऊपर बना हुआ था।

पंडित के एक पुजारी, कुलदेवी के मंदिर के पास गए और द्वार खोल दिए। जानवी और पृथ्वी जब अपने सामने कुलदेवी की मूर्ति को देखते हैं, तो वे दोनों जैसे कि हिप्नोटाइज हो गए थे। माता की वह अलौकिक मूर्ति ने जैसे उन दोनों को ही अपने वश में कर लिया था। आखिर माता के चेहरे पर ऐसा अद्भुत तेज जो था।

पृथ्वी को पता ही नहीं चला कि कब उसके हाथ सिंदूर की तरफ बढ़ गए और जानवी को पता ही नहीं चला कि कब वह सिंदूर उसकी मांग को सजा गया।

आस्तिक इस वक्त अपनी मां के कमरे में था। वह पियानो पर वही खतरनाक धुन बज रहा था लेकिन इस बार उस धुन के खतरनाक होने से ज्यादा आस्तिक के चेहरे पर जो बदलते भाव थे, वह ज्यादा खतरनाक लग रहे थे।

उसकी उंगलियां पियानो की पर चल रही थी और बंद आंखों के सामने सिर्फ अरुणिमा का वो मुरझाया और आंसुओं से भीगा हुआ चेहरा दिख रहा था।

आस्तिक को पता ही नहीं चल रहा था कि वह यह सब क्यों महसूस कर रहा है? क्यू उसे अरुणिमा के लिए बुरा लग रहा है?

जैसे-जैसे अरुणिमा की बातें उसके ख्याल में आ रही थी, वैसे-वैसे उसकी उंगलियां और तेजी से पियानो के बटन को दबाये जा रही थी, लेकिन इस बार वह इतनी तेज बहाव में बह गया कि पियानो की बटन एक आवाज के साथ टूट गई और आस्तिक की सारी उंगलियां खून से सन गई। आस्तिक ने जोर-जोर से सांस लेते हुए अपने हताश मन को संभाला, लेकिन वह संभल नहीं रहा था। उसने अपना चेहरा ऊपर किया और जोर से चिल्लाने लगा…

“अरुणिमा......”

कुछ देर अपनी मां के कमरे में बिताने के बाद आस्तिक वापस अपने कमरे में लौट आया था। जब वह वापस कमरे में आया तो देखा अरुणिमा फर्श पर बिना कपड़ों के ही लेटी हुई है, लेकिन इस वक्त वह बिल्कुल सिकुड़कर एक छोटे से गेंद की तरह लेटी हुई है।

उसे ऐसा देखकर आस्तिक का मन कचोटने लगा था। वह देख पा रहा था अरुणिमा के पूरे शरीर पर जख्मों के निशान है। आस्तिक को समझ ही नहीं आ रहा था कि अरुणिमा के घाव उसे बेचैन क्यों कर रहे हैं? लेकिन वो बहुत धीरे कदमों से अरुणिमा के पास जाता है और उसे अपनी गोद में उठा लेता है। अरुणिमा शायद इस समय नींद की दूसरी दुनिया में थी, इसीलिए उसे पता ही नहीं चला कि कब आस्तिक ने उसे अपनी गोद में उठाकर बिस्तर पर रख दिया।

उसने अरुणिमा को ब्लैंकेट से ढक दिया. पर वह उसका वह निराशा से भरा छोटा सा सदा चेहरा निहार रहा था. उसके गालों पर आंसुओं की धार एक लकीर की तरह खींच रही थी और उसके होंठ सूखे हुए थे।

आस्तिक अपने मन में उठ रही भावनाओं को संभाल नहीं पाया और धीरे-धीरे उसने हल्के से अरूणिमा के होठों को छू लिया, लेकिन शायद यह हल्की सी छुअन भी अरूणिमा के लिए एक दर्द ही था। उसके मुंह से हल्की सी आह निकल गई।

आस्तिक बस अरुणिमा के उस चेहरे को निहारता है, लेकिन अब वह इस कमरे में और खुद को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। अरुणिमा को जितना वह देखता उतना ही उसका मन आत्मग्लानि से भर जाता, इसीलिए वह कमरे की लाइट बंद करके अपनी मां के कमरे में चला गया।

जानवी और पृथ्वी दिल्ली के लिए निकल चुके थे,लेकिन इस वक्त उन दोनों में से कोई भी एक दूसरे से बात नहीं कर रहा था। दादाजी और दादी जी के परिवार ने उनके लिए एक प्राइवेट टैक्सी बुक की थी और साथ ही उन्हें ढेर सारे तोहफे भी दिए थे।

वह दोनों कुलदेवी के मंदिर से सीधे दिल्ली के लिए निकल गए थे। ड्राइवर आगे टैक्सी चला रहा था और पीछे वाली सीट पर जानवी और पृथ्वी खिड़की की तरफ मुंह किए हुए बैठे थे।

ड्राइवर बैक मिरर से जानवी और पृथ्वी को देखकर कहता है… “लगता है आप दोनों की नई-नई शादी हुई है।”

ड्राइवर की बात पर जानवी और पृथ्वी दोनों चौक जाते हैं और हैरानी से ड्राइवर को देखने लगते हैं। पृथ्वी गुस्से में कहता है… “काम करो अपना! सड़क पर ध्यान दो बातों पर नहीं।”

पृथ्वी की डांट सुनकर ड्राइवर चुपचाप से सड़क पर देखने लगता है। जानवी एक नजर पृथ्वी को देखती है और फिर खिड़की से बाहर देखने लगती है।

पृथ्वी खिड़की से बाहर देखते हुए अपने मन में खुद को खोजते हुए कहता है... “क्या जरूरत थी इसकी मांग में सिंदूर लगाने की? वैसे भी यह उन लोगों की जिद के कारण हुआ था, मेरी ऐसी कोई इंटेंशन नहीं थी और शायद जानवी का भी ऐसा कोई इरादा नहीं रहा होगा। हां बिल्कुल यह बस एक हादसा था। मैं जानवी को उस अस्पताल में छोड़ दूंगा, जहां उसकी मां एडमिट है और उसके बाद मेरा और जानवी का कभी अमना सामना नहीं होगा और यह शादी.. शीट यार! क्या बोल रहा हूं मैं.. यह शादी कैसे हो सकती है? सिर्फ एक सिंदूर लगा देने से कोई शादी तो नहीं हो जाती ना? फालतू का मेलो ड्रामा।”

पृथ्वी की नजर जानवी पर जाती है जिसके चेहरे पर एक्सप्रेशन बदल रहे थे, शायद वह किसी गहरे विचार में थी।

तभी उनकी गाड़ी एक अस्पताल के सामने आकर रूकती है। जानवी हैरान हो जाती है क्योंकि यह वह अस्पताल तो नहीं है जहां उसे जाना था। वह हैरानी से पृथ्वी को देखने लगती है तो पृथ्वी अपनी तरफ का दरवाजा खोलते हुए कहता है… “बाहर निकालो”

जानवी गाड़ी से बाहर आती है। वह दोनों अपना सामान उतारते हैं और टैक्सी वहां से चली जाती है। जानवी कहती है… “यह तुम मुझे कहां लेकर आए हो? यह तो वह वाला हॉस्पिटल नहीं है?”

पृथ्वी ने कहा… “तुम्हारी मां को यहां शिफ्ट कर दिया गया है। उनका यहां पर बहुत अच्छे से इलाज चल रहा है। तुम्हारी मां इस समय 7th फ्लोर के vip रूम में है, अगर तुम्हें यहां पर कोई भी दिक्कत हो, कोई भी परेशान हो या फिर तुम्हारी मां के इलाज में कोई भी लापरवाही बरत रही होगी, तो तुम डॉ नरेश से इस बारे में बात कर लेना।”

जानवी धीरे से हां में सर हिलाती है और अपना बैग उठाकर कहती है… “थैंक्स मेरे लिए इतना सब कुछ करने के लिए, पर अफसोस बदले में मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकती. लेकिन अगर जिंदगी ने दोबारा मौका दिया तो मैं तुम्हारी मदद जरूर करूंगी।”

पृथ्वी एक गहरी सांस छोड़ता है और कहता है… “इसकी कोई जरूरत नहीं है। तुम बस अपनी मां का ख्याल रखो.” यह कहकर पृथ्वी जाने के लिए मुड़ता ही है कि तभी वह एक कदम रुक जाता है और पलट कर जानवी को देखकर कहता है.. “क्या यह सिंदूर तुम्हारे लिए मायने रखता है?”

जानवी एकदम से चौंक जाती है, पृथ्वी के इस सवाल से और फिर वह पृथ्वी को देखते हुए इस पर यह सवाल दोहरा देती है… “क्या तुम्हारे लिए मायने रखता है?”

पृथ्वी जल्दी से ना में सर हिलता है और कहता है… “नहीं! यह सिर्फ एक बेवकूफी में किया गया काम था, इतने सारे लोग थे और फिर कुलदेवी की मूर्ति, जिसे देखकर पता नहीं कैसे मैं हिप्नोटाइज हो गया था और फिर यह हो गया, इसलिए मेरे लिए यह सब कोई कुछ मायने नहीं रखता है।”

जानवी के चेहरे पर एक तिरछी मुस्कान आ जाती है और वह हां में सर हिलाते हुए कहती है… “फिक्र मत करो, मेरे लिए भी यह मायने नहीं रखता है।”

पृथ्वी गहरी सांस छोड़ता है और कहता है… “शुक्र है फिर तो बात ही खत्म हो गई. अब मैं चलता हूं, अपना ख्याल रखना।”

जानवी धीरे से हां में सर हिलाती है और पृथ्वी वहां से एग्जिट की तरफ चला जाता है। जानवी पृथ्वी को तब तक जाता हुआ देखती है, जब तक की पृथ्वी उसकी आंखों के सामने से ओझल नहीं हो गया।

न जाने क्या चल रहा था जानवी के मन में, पर उसका मन बहुत ज्यादा बेचैन हो रहा था। पृथ्वी का एक-एक बड़ता कदम उसके मन में 100 तरह के सवाल पैदा कर रहा था। अनजाने में ही उसका हाथ अपनी मांग पर चला गया. मांग में लगे सिंदूर का एहसास पाते ही जानवी का पूरा शरीर अचानक से कांप जाता है। वह जल्दी अस्पताल के अंदर भागती है और एक अस्पताल स्टाफ से पूछ कर जल्दी से वॉशरूम चली जाती है।

उस हादसे को हुए एक हफ्ता बीत गया था, लेकिन उस हादसे के बाद भी अरुणिमा के दिनचर्या में कुछ खास बदलाव नहीं आया। उसे अभी भी फर्श पर ही सोना पड़ता है और वह सारे काम करने पड़ते हैं जो वह पहले किया करती थी। हां लेकिन क्योंकि अमृता ताई इस वक्त यहां पर थी तो अरुणिमा को खाने के लिए अच्छा ही खाना मिलता था। वह भी वही सब खाया करती थी जो बाकी सब खाते थे।

पर इन सब के अलावा एक और बात थी, आस्तिक अरुणिमा से दूर ही रहता था। उसने अरुणिमा के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की और ना ही उसके साथ मार पिटाई की। अरुणिमा को इस बात के लिए बहुत तसल्ली थी, कि आस्तिक उससे दूर है और वह दूर ही रहे तो ज्यादा बेहतर है, लेकिन अपनी मां का व्यवहार उसके दिल में घाव का काम कर रहा था। वह अपनी मां के इस रवैया से बहुत ज्यादा आहत हुई थी। आस्तिक के घाव से भी ज्यादा दर्द उसे अब इस बात से हो रहा था कि उसकी मां ने उसे ठुकरा दिया है।

जैसा कि अरुणिमा की मां ने उसे एडजस्ट करने के लिए कहा, वैसे ही वह एडजस्ट कर रही है. और हर रात यही दुआ करती है कि आस्तिक आज तो उसे नहीं मारेगा। आस्तिक चुपचाप कमरे में आता है, अपने कपड़े लेकर बाथरूम चला जाता है और कपड़े बदलकर 1 घंटे के लिए कमरे से गायब हो जाता है। वह अपनी मां के कमरे में रहता है और अपनी मां की तस्वीर से बात करता है। वह वापस कमरे में आता है और चुपचाप बेड पर जाकर सो जाता है। इस बीच ना वह अरुणिमा को देखता है और ना ही उससे बात करता है। यहां तक कि उसे कुछ चाहिए भी होता है तो वह खुद ही लेता, अरुणिमा को नहीं कहता है।

आज रात का भी कुछ यही सीन था. अरुणिमा फर्श पर लेटी हुई थी और आस्तिक बेड पर सो रहा था, लेकिन अरुणिमा को नींद नहीं आ रही थी। उसका जीवन इतना कष्टदायक था, उसे सुकून की नींद कहां से आती।

अरुणिमा फर्श पर लेटे-लेटे बस अपने जीवन के बारे में सोच रही थी… “पता नहीं मेरी जिंदगी मुझसे क्या चाहती है? मैं भविष्य में क्या करूंगी मुझे नहीं पता? क्या मुझे मेरी पढ़ाई फिर से शुरू कर देनी चाहिए?”

क्या मुझे इस बारे में राजा साहब से बात करनी चाहिए? लेकिन पिछले एक हफ्ते से हम एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रह रहे हैं. पर मुझे याद है पिछली बार जब मैंने उनसे अपनी पढ़ाई के बारे में बात की तो उन्होंने मुझे कितना मारा था और यह कहा था कि मैं वहां पर लड़कों को रिझाने जा रही हूं,और अगर उन्होंने ऐसा फिर से किया तो?”

खुद की ही बातों पर हंसते हुए कहती है… “कर देंगे तो कौन सी बड़ी बात है और कौन सा पहली बार करेंगे? अब तो मुझे आदत हो गई है उनके मार कि, उनके अपमान की, लेकिन मुझे कम से कम कोशिश तो करनी चाहिए।”

अरुणिमा यह सब सोच ही रही थी कि तभी उसके कानों में आस्तिक की आवाज आती है। वह चौंक कर फर्श पर बैठ जाती है और आस्तिक को देखने लगती है। जो नींद में घबराई हुई आवाज में कह रहा था..

“माँ!! रोओ मत! अरे, रुको!! मत करो... तुम ऐसा क्यों कर रही हो! माँ, मैं यहाँ हूँ . रोओ मत। माँ, मैं हमेशा तुम्हारी हिफाजत करुंगा।”

अरुणिमा हैरान हो जाती है। लगभग एक हफ्ते से वह हर रात आस्तिक को इसी हालत में देख रही थी।

वह नींद में बड़बड़ाता रहता है और उसका चेहरा पीला पड़ जाता है। कमरे में ए.सी.चलता है लेकिन फिर भी आस्तिक के चेहरे पर पसीने आता है।

अरुणिमा रोज रात आस्तिक को इसी हालत में देखी जा रही थी. लेकिन आज तो यह कुछ ज्यादा ही था। आज शायद आस्तिक कोई बुरा सपना देख रहा था।

उसकी घबराहट और परेशानी देखकर अरुणिमा अपनी जगह से खड़ी होती है और धीरे से आस्तिक को देखकर अपने मन में कहती है… “क्या मुझे उनके पास जाना चाहिए?”

तभी अरुणिमा के मन में दूसरा विचार आता है, नहीं बिल्कुल भी नहीं! मैं उनके पास जाऊंगी और कहीं उन्होंने मुझे ही गलत समझ कर मारना शुरू कर दिया तो?”

लेकिन अरुणिमा का दिल उसे कहता है.. “उनका मारना तुम्हारे लिए कौन सी नई बात है? उन्होंने तो तुम्हें पहले भी मारा है लेकिन फिर भी तो तुम उनके लिए काम करती आई हो ना और आज तो उन्हें तुम्हारी मदद की जरूरत है। वह एक मॉन्स्टर हो सकते हैं पर तुम नहीं हो।”

अरुणिमा ने धीरे से हां में सर हिलाते हुए कहा… “हां सही कहा, वह सच में एक मॉन्स्टर है पर मैं तो नहीं हूं। मेरे अंदर मेरी मां के दिए हुए अच्छे संस्कार हैं, जो यह सीखाते हैं कि हर किसी की मदद करनी चाहिए। भले सामने वाले से कितनी ही नफरत क्यों ना करते हो।”

अरुणिमा आस्तिक के पास चली जाती है और वह उसके बेड पर उसके सिरहाने बैठ जाती है। वह धीरे से आस्तिक का हाथ अपने हाथों में लेती है और उसे सहलाने लगती है, और अपने दूसरे हाथ से उसके बालों को सहलाने लगती है।

आस्तिक के चेहरे पर घबराहट अभी भी थी। अरुणिमा ने धीरे से कहा… “कुछ भी नहीं हुआ, सब ठीक है। कोई आपको नुकसान नहीं पहुंचा रहा है शांत हो जाइए।”

धीरे-धीरे अस्तिक शांत होने लगा। उसके चेहरे से घबराहट चली गई और उसका चेहरा सामान्य हो गया। उसके हाथ पैर भी कांपने बंद हो गए थे और वह आराम से सुकून की नींद में था। अरुणिमा ने धीरे से आस्तिक के बालों से अपना हाथ हटाने लगी क्योंकि अब उसे फर्श पर जाकर सोना था।

आस्तिक के हाथों से अपना हाथ हटाने के बाद अरुणिमा खड़ी होती है और फर्श पर जाने के लिए मुड़ती है, पर तभी किसी ने उसकी साड़ी का आंचल पकड़ लिया। अरुणिमा हैरानी से पीछे पलट कर देखती है तो यह आस्तिक था, जो उसकी साड़ी के आंचल को खींच रहा था।

आस्तिक ने नींद की आवाज में ही कहा… “मत जाओ, कहीं मत जाओ!”

अरुणिमा धीरे से आस्तिक के पास आती है और अपनी साड़ी उसके हाथ से निकालने की कोशिश करती है, लेकिन आस्तिक ने अरुणिमा की कमर पर हाथ रखकर उसे अपने सीने पर खींच लिया। अरुणिमा एक पल के लिए चौक जाती है पर आस्तिक नींद मैं ही अरुणिमा को अपने सीने में समेटे हुए कहता है… “मेरे पास रहो और हमेशा मेरे पास ही रहना।”

पूरे 1 हफ्ते बाद अरुणिमा आस्तिक के स्पर्श को महसूस कर पा रही थी. लेकिन आस्तिक के इस स्पर्श में ना तो कठोरता थी और ना ही कहीं से भी क्रूरता नजर आ रही थी। यह स्पर्श कुछ ऐसा था कि जो अरुणिमा को अपने से दूर नहीं जाने दे सकता है।

अरुणिमा हैरानी से आस्तिक को देखते हुए कहती है… “क्या यह सपना है या सच? क्या आप मेरे साथ हमेशा ऐसे ही नरमी से पेश आएंगे? क्या आप मुझे कोई तकलीफ नहीं देंगे? क्या हमारा जीवन भी एक सामान्य जोड़ी की तरह है? क्या हम बाकी पति पत्नी की तरह नॉर्मल लाइफ जीने वाले हैं?”

अरुणिमा अपने ही सवालों में उलझी हुई थी और जवाब उसके पास नहीं था। उनके रिश्ते में इतना खालीपन था कि उन्हें अब समझ में ही नहीं आ रहा है कि इस रिश्ते को वह कैसे समझे।

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Deepika Sarkar

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