
अरुणिमा क्या ही बोलती। सब्जियां तो उसकी फ़ेवरेट थीं और जो उसकी प्लेट में रखी गई थी, यह तो उसकी सबसे ज़्यादा मनपसंद सब्ज़ी थी। उसका बस चलता तो वह पूरी कढ़ाई भरकर इसे खा सकती थी, लेकिन आस्तिक ने अपना ख़ौफ़ कुछ इस तरीके से बनाया था कि अरुणिमा अपना हाथ भी नहीं हिला पा रही थी। आस्तिक को पता चल गया था कि अरुणिमा के ना खाने की वजह क्या है। एक तरह से तो उसे इस बात की ख़ुशी भी थी कि उसकी कठपुतली उसके इशारों पर ही नाचती है। लेकिन वह अमृता ताई के सामने ज़ाहिर नहीं करना चाहता था, इसीलिए उसने धीरे से अरुणिमा को देखते हुए कहा… “अरुणिमा खाना खाओ। ताई ने कितने प्यार से तुम्हें परोसा है ना। खाना खाओ। माना तुम्हें सब्ज़ियां पसंद नहीं हैं, लेकिन ताई के लिए, उनका मन रखने के लिए तो खा ही सकती हो।”
अरुणिमा हैरानी से राजा साहब को देखती है, तो आस्तिक अपनी तीखी निगाहों से उसे खाना खाने का इशारा करता है।


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