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आरुषि मिली अपने परिवार से

डॉक्टर ने जैसे ही अरुणिमा से कहा कि वो प्रेग्नेंट है, अरुणिमा की आंखें एकदम से बड़ी हो जाती हैं और वो अपनी जगह पर ही स्थिर हो जाती हैं, जबकि मीरा दूसरी तरफ ऐसे कूद-कूदकर नाच रही थी जैसे कि अरुणिमा नहीं, बल्कि वो खुद चौथी बार प्रेग्नेंट हो गई हो।

अरुणिमा अभी भी अपनी जगह पर किसी पत्थर की तरह बैठी हुई थी। आखिरी बार जब उसका मिसकैरेज हुआ था और उसने अपने जुड़वां बच्चों को खो दिया था, तब उसने सोचा भी नहीं था कि उसे फिर से ये खुशी महसूस होगी और वो दोबारा इस एहसास को जी पाएगी। मां बनने का एहसास एक बार फिर से उसके दिल को गुदगुदा रहा था, लेकिन पिछली बार जो डर उसके दिल में था, वो अब फिर से उसके ऊपर हावी हो गया था।

मीरा उसके साथ खुश हो ही रही थी और उसकी खुशी को महसूस कर ही रही थी कि अचानक उनके कानों में कुछ गिरने की आवाज आती है। वे दोनों चौंककर पीछे देखती हैं, और जब अरुणिमा ने अपने सामने आस्तिक को देखा तो उसकी हैरानी और भी बढ़ जाती है।

दरअसल, जब अरुणिमा हॉस्पिटल आ रही थी तो उसने ही आस्तिक को मैसेज किया था कि उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है। हालांकि घबराने वाली बात नहीं थी, लेकिन फिर भी मीरा उसे चेकअप के लिए अस्पताल ले जा रही थी। आस्तिक बहुत ज्यादा डर गया था। अरुणिमा के लिए वो अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। इसीलिए उसने जल्दी-जल्दी अपनी सारी मीटिंग्स कैंसिल कीं और हॉस्पिटल आ गया। वो सीधे डॉक्टर के केबिन में आ गया, बिना किसी इंफॉर्मेशन के।

जैसे ही उसने दरवाजे पर पहला कदम रखा, उसने डॉक्टर की वो बात सुनी जो अरुणिमा से कह रहे थे कि वो प्रेग्नेंट है। ये सुनते ही उसके हाथ से फोन छूटकर जमीन पर गिर गया और वो एकदम से अरुणिमा को देखने लगा।

अरुणिमा हैरत से आस्तिक को देखती हुई खड़ी हो गई। उसकी आंखें सिर्फ आस्तिक की निगाहों में टिकी हुई थीं और उसके पास कहने को कोई शब्द नहीं था। लेकिन एक डर जो अरुणिमा के चेहरे पर नजर आ रहा था, उसे आस्तिक ने महसूस कर लिया था। और वही डर शायद आस्तिक के दिल के किसी कोने में भी था। आखिर ये डर होना लाजिमी भी था — इन दोनों ने अपने पहले बच्चों को खो दिया था। और उसके बाद अरुणिमा की मेडिकल कंडीशन्स ने ये कह दिया था कि वो कभी मां नहीं बन पाएगी।

पर इन सबके बावजूद भी अरुणिमा फिर से मां बनने वाली थी। लेकिन वो डर, वो एहसास जो इन दोनों की नजरों में था, शायद ये दोनों ही समझ सकते थे कि इस वक्त वो कैसा महसूस कर रहे हैं।

आस्तिक आगे आता है और अरुणिमा के सामने आकर खड़ा हो जाता है। उसकी आंखें लाल थीं, शायद वो रोने वाला था, लेकिन उसने अपने आंसुओं को रोक लिया था। पूरे जीवन में आस्तिक सिर्फ दो बार रोया था — एक बार जब उसने अपने बच्चों को मिट्टी तले दफनाया था और दूसरी बार जब उसने अरुणिमा के लिए डिवोर्स पेपर पर साइन किया था।

अरुणिमा ने आज भी आस्तिक की लाल आंखों को पहचान लिया था। उसने अपने आंसुओं को रोके रखा है, ये बात अरुणिमा समझ चुकी थी और इसी ने उसे और ज्यादा परेशान कर दिया था।

आस्तिक अरुणिमा के पास आया और उसने धीरे से एक हाथ से अरुणिमा को अपनी बाहों में लेकर उसके सिर को सहलाते हुए कहा — “कंग्रेचुलेशंस।”

अरुणिमा ने कसकर अपनी आंखें बंद कर लीं और आस्तिक के सीने से लग गई। मीरा उन दोनों को मुस्कुराकर देख रही थी।

दिव्यांश के जन्मदिन के बाद आस्तिक, अरुणिमा को लेकर अपने घर आ गया था — ग्रीन माउंटेन का उनका आशियाना, जहां अब अरुणिमा की ऐसी सेवा हो रही थी जैसे वो किसी महारानी हो। आस्तिक ने सारा काम घर पर शिफ्ट कर लिया था और अरुणिमा के बिजनेस को भी अपने बिजनेस के साथ मर्ज कर दिया था।

आस्तिक, अरुणिमा को बेड से नीचे कदम भी नहीं रखने देता था। पहली बार जो गलती उसने की थी — अरुणिमा को अकेला छोड़ने की — अब वो गलती गलती से भी नहीं दोहरा रहा था। यहां तक कि उसने हर जगह कैमरे लगवा दिए थे। वॉशरूम में भी आस्तिक अरुणिमा पर नजर रखता था।

देखते ही देखते चार महीने बीत गए। अरुणिमा का सेकंड सेमेस्टर टेस्ट होना था।

लेकिन इन दिनों आस्तिक अपने ही घर में इधर-उधर टहलता रहता था क्योंकि जैसे-जैसे अरुणिमा की प्रेग्नेंसी बढ़ रही थी, उसके हार्मोन्स बदल रहे थे और वो बहुत ज्यादा चिड़चिड़ी और नखरेली होती जा रही थी। ऐसा नहीं था कि आस्तिक को उसके नखरों से कोई प्रॉब्लम थी, लेकिन जिस तरीके से अरुणिमा बिहेव कर रही थी, आस्तिक हैरान था।

रात के 1 बजे थे। आस्तिक आराम से बेड पर फैलकर सो रहा था जबकि अरुणिमा बेचैनी से इधर-उधर करवटें बदल रही थी। उसका पेट हल्का बाहर निकल आया था। चार महीने की प्रेग्नेंसी में ही उसकी हालत खराब हो रही थी। अब आस्तिक उसे कुछ करने नहीं देता था, जिसकी वजह से वो बैठे-बैठे और ज्यादा आलसी हो गई थी। उसे इस वक्त नींद नहीं आ रही थी और आस्तिक को सोते हुए देखकर उसे और गुस्सा आ गया। उसने आस्तिक को एक जोर का धक्का मारा जिससे आस्तिक संभल नहीं पाया और नीचे जमीन पर गिर गया।

वो एकदम से हड़बड़ाकर उठा और जल्दी से अरुणिमा से कहा, “क्या हुआ? क्या हुआ? तुम ठीक तो हो ना? बेबी आने वाला है क्या? मैं डॉक्टर को फोन करूं? गाड़ी निकालूं? तुम्हारी मम्मी को फोन करूं?”

अरुणिमा ने गुस्से में मुंह बनाते हुए बोला, “किसी को फोन नहीं करना है! अभी बच्चा नहीं आया है, बच्चे के आने में अभी टाइम है… तुम सो क्यों रहे हो?”

आस्तिक एकदम से अरुणिमा को देखकर हैरान हो गया। उसने चौंकते हुए कहा, “व्हाट यू मीन कि मैं सो क्यों रहा हूं? रात हो रही है! सारा दिन ऑफिस का काम, अपना बिजनेस, तुम्हारा बिजनेस, और साथ में तुम्हारे मूड स्विंग्स संभालता हूं — इंसान हूं, थक जाता हूं!”

अरुणिमा ने अपना होंठ बाहर निकालते हुए किसी छोटे बच्चे की तरह मुंह फुला लिया और आस्तिक को अपनी टिमटिमाती आंखों से देखने लगी। आस्तिक ने गहरी सांस छोड़ी और अरुणिमा के सामने बैठ गया। उसने अरुणिमा के बालों को सहलाते हुए कहा, “अच्छा ठीक है, सॉरी, मैं गलती से सो गया था। आज के बाद नहीं सोऊंगा। तुम जो कहोगी वो करूंगा। बताओ, क्या हुआ? क्यों परेशान हो रही हो?”

“मुझे क्रेविंग हो रही है…” अरुणिमा ने मासूमियत से कहा।

तो आस्तिक मुस्कुरा उठा। जबसे अरुणिमा की मॉर्निंग सिकनेस शुरू हुई थी, उसकी क्रेविंग भी बढ़ती जा रही थी और वो कभी भी कुछ ऐसा खाने की डिमांड करती जो आस्तिक के लिए भी मुश्किल हो जाता। लेकिन मुश्किल ही होता, नामुमकिन नहीं। अपनी मलिका के लिए आस्तिक हर नामुमकिन कोशिश को मुमकिन कर देता था। अब तक अरुणिमा ने जितनी चीजों की डिमांड की थी, आस्तिक ने उन सारे सामान से किचन भर दिया था। लेकिन एक बार खाने के बाद अरुणिमा दोबारा वही चीज मांगती ही नहीं; अगली बार उसकी क्रेविंग किसी और चीज के लिए होती।

आस्तिक हार मान गया। उसने थकते हुए कहा, “अच्छा ठीक है, क्या खाना है तुम्हें? मोमोज, चाइनीज़, फ्रेंच फ्राइज, इटालियन? जो भी खाना है, किचन में सब है। तुम बोलो, मैं अभी बना कर लाता हूं।”

“मुझे डार्क चॉकलेट आइसक्रीम खानी है…” अरुणिमा ने जैसे ही ये कहा, आस्तिक की आंखें एकदम बड़ी हो गईं। वो हैरानी से बोला, “रात के 1 बजे तुम्हें आइसक्रीम खानी है?”

अरुणिमा ने मासूमियत से सिर हिलाया। आस्तिक ने अपना माथा पीट लिया और बोला, “अरुणिमा यार, कुछ और खा लो ना। घर में इतना सारा सामान पड़ा है, लेकिन बस एक आइसक्रीम बनाने का सामान ही नहीं है! अगर होता तो मैं तुम्हारे लिए खुद बना देता। इतनी रात को मैं कहां से आइसक्रीम लेकर आऊं? अभी तो कोई डिलीवरी भी नहीं देगा…”

अरुणिमा ने तुरंत झुंझलाते हुए कहा, “मैं तुम्हारे बच्चे की डिलीवरी करूंगी, तुम्हें उसकी परवाह नहीं है! तुम्हें मेरी भी परवाह नहीं है! मैं कल ही मम्मी के पास चली जाती हूं, वहां मेरी अच्छे से देखभाल हो जाएगी, और मैं जो चाहूंगी, वो मुझे खाने के लिए भी देंगे…”

ऐसा कहकर अरुणिमा नाराज़ बीवी की तरह दूसरी तरफ उतरने ही वाली थी कि आस्तिक ने उसे रोक लिया और बोला, “अच्छा ठीक है, गुस्सा मत हो। चलो, ले चलता हूं तुम्हें आइसक्रीम खिलाने।”

अरुणिमा मुस्कुरा उठी। उसने जल्दी से सिर हिलाया। उसने इस समय नॉर्मल सी शर्ट और ट्राउज़र पहन रखे थे, बाल ऊपर बंधे हुए थे, और हाथों में एक टेडी बेयर था — वो बीवी कम, बच्ची ज्यादा लग रही थी। वहीं दूसरी तरफ, आस्तिक ने हाफ स्लीव की शर्ट और नीचे हाफ पैंट पहन रखी थी।

आस्तिक अरुणिमा को लेकर घर के बाहर आता है। उसने अरुणिमा को गाड़ी की फ्रंट सीट पर बिठाया और खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। वो ड्राइव करते हुए अरुणिमा को लेकर जा रहा था। सच में, अरुणिमा इस वक्त एक छोटी सी बच्ची की तरह बिहेव कर रही थी और आस्तिक उसके हर नखरे बहुत शांति से उठा रहा था। वो उसे लेकर उस मॉल में पहुंचा जो रात के समय भी खुला रहता था और जिसका आइसक्रीम पार्लर आस्तिक ने खुद खुलवाया था।

अरुणिमा की आइसक्रीम क्रेविंग की ज़िद पूरी करके आते हुए आखिरकार आस्तिक को सुबह हो गई। सुबह के अगले दिन जब आस्तिक की गाड़ी अपने घर के सामने पार्क होती है तो उसने देखा कि पहले से ही एक गाड़ी वहां पर खड़ी है। यह देखकर आस्तिक हैरान हो गया। वह अरुणिमा को गाड़ी से बाहर निकालता है, लेकिन जैसे ही अरुणिमा ने उस गाड़ी को देखा, उसकी आँखें एकदम से चमक जाती हैं और वह तुरंत खुश होते हुए कहती है — “आस्तिक, मम्मी-पापा आए हैं!”

आस्तिक यह सुनकर हैरान हो जाता है, लेकिन अरुणिमा की खुशी देखते बन रही थी। आस्तिक उसे लेकर घर के अंदर आता है तो सच में बृजेश जी और आशा जी आए हुए थे। वे आस्तिक और अरुणिमा को एक साथ देखकर बहुत खुश हो रहे थे।

आशा जी अरुणिमा के पास आती हैं और उसके माथे को चूमते हुए उसके पेट को देखती हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए अरुणिमा को गले लगाया और खुश होते हुए कहा — “कंग्रॅचुलेशन! बहुत-बहुत मुबारक हो, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूं।”

बृजेश जी भी उनके पास आते हैं और मुस्कुराते हुए अरुणिमा के सिर पर हाथ रखते हैं। बृजेश जी की मुस्कुराहट का आस्तिक जवाब देता है और उन्हें देखकर “हेलो” कहता है।

थोड़ी देर बाद सारा परिवार एक साथ सोफे पर बैठा हुआ था। अरुणिमा बता रही थी कि आस्तिक उसका कैसे ख्याल रखता है और यह देखकर बृजेश जी और आशा जी बहुत खुश हो रहे थे। वे अरुणिमा की प्रेगनेंसी की खबर सुनकर भी बहुत खुश हुए थे और उस समय आना चाहते थे, लेकिन उस वक्त अरुणिमा ने उन्हें मना कर दिया था। उस समय उन्हें किसी और के पास जाना ज़्यादा ज़रूरी था। आरुषि के बारे में सुनकर उन दोनों को भी बहुत बुरा लगा था। वे आरुषि के लिए कभी बुरा नहीं चाहते थे। उनके लिए आरुषि भी उनकी बेटी थी। उन्होंने दोनों बेटियों को एक साथ गोद लिया था और आरुषि को भी उतना ही प्यार करते थे, लेकिन आरुषि की जो कंडीशन थी, उसने खुद को ही सबसे दूर कर लिया था।

बृजेश जी और आशा जी को आरुषि के बारे में सुनकर बहुत तकलीफ़ हुई थी। वे उससे मिलना चाहते थे, बात करना चाहते थे, लेकिन शायद अब यह होना मुमकिन नहीं था।

आशा जी ने आस्तिक को डांटते हुए कहा — “आस्तिक, हमें खुशी है कि तुम अरुणिमा की इतनी केयर करते हो, उसकी इतनी देखभाल करते हो और उसकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ते, लेकिन इतनी रात को इसे लेकर बाहर जाने का क्या मतलब है? तुम जानते हो ना इसकी कंडीशन ठीक नहीं है, तो फिर तुम इसे इतनी रात को बाहर क्यों लेकर गए? वह भी अकेले, बिना किसी सिक्योरिटी गार्ड के! जानते हो ना यह कितना खतरनाक हो सकता है?”

आस्तिक ने तुरंत कहा — “मम्मी, मुझसे कुछ कहने से पहले आप अपनी बेटी को समझाइए। इसके लिए मैंने पूरे किचन में ग्रॉसरी मार्केट खोल रखा है, लेकिन नहीं, मैडम को रात के 1 बजे आइसक्रीम खानी थी। तो स्पेशली शहर वाले मॉल तक लेकर गया था और आइसक्रीम की दुकान ओपन करवा कर इसकी फरमाइश पूरी की है। लेकिन उसके बाद भी मैडम का मन कहां भर रहा था! पांचवीं आइसक्रीम ज़बरदस्ती इसके हाथ से छीनी है मैंने, और उसके बाद पूरे रास्ते मुझसे लड़ती हुई आई है!”

आशा जी की आँखें एकदम से बड़ी हो जाती हैं और वह अरुणिमा की तरफ देखने लगती हैं, जो मासूम सी अपने पेरेंट्स को देख रही थी, लेकिन उन निगाहों में सिर्फ आस्तिक ही आ सकता था। आशा जी ने लगभग अरुणिमा को डांटते हुए कहा — “पागल हो गई हो क्या! अभी सेहत की ज़रा भी परवाह नहीं है अपनी? अपनी ना सही, पर अपने बच्चों की परवाह तो करो ना! बाहर इतनी ठंड हो रही है और ऐसे में तुम्हें आइसक्रीम खानी थी! मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि जो होने वाला है, वह तुम दोनों के भरोसे रहेगा कैसे! तुम दोनों खुद को नहीं संभाल पा रहे हो, उस मासूम सी जान को कैसे संभालोगे?”

आस्तिक और अरुणिमा दोनों चुपचाप उनकी बातें सुन रहे थे और उनके डांट को बिल्कुल किसी आदर्शवादी बच्चे की तरह झेल रहे थे। आखिर हो भी क्यों ना, वे दोनों खुद अब पैरेंट्स बनने वाले थे, लेकिन बचपना उन दोनों में अभी भी एक-दूसरे के लिए झलक जाता था।

कुछ दिनों बाद अरुणिमा का सेकंड सेमेस्टर टेस्ट हो गया था और सब कुछ नॉर्मल था। आज आस्तिक अरुणिमा को बहुत गुस्से में देख रहा था और अरुणिमा उसे इग्नोर करते हुए तैयार हो रही थी। आस्तिक ने लगभग उसके हाथों से कंघी छीनकर ड्रेसिंग टेबल पर पटकते हुए कहा — “पागल हो गई हो क्या? जब मैं मना कर रहा हूं तो क्यों एक ही सवाल बार-बार कर रही हो? क्या ज़रूरत है तुम्हें जेल जाकर आरुषि से मिलने की?”

अरुणिमा ने फिर से कंघी उठा ली और अपने बालों को संभालते हुए कहा — “मैं आरुषि से मिलने इसलिए जा रही हूं क्योंकि वह मुझसे मिलना चाहती है। और तुम्हें तो पता है ना, उसकी क्या कंडीशन है! ऐसे में डॉक्टर ने उसे अपना ट्रीटमेंट करवाने के लिए कहा है, पर वह ज़िद पर अड़ी हुई है कि जब तक मुझसे नहीं मिलेगी, अपना ट्रीटमेंट आगे नहीं कर पाएगी। और यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है, आस्तिक — मम्मी के लिए भी है। मम्मी भी उससे मिलना चाहती हैं, पर आरुषि उनसे नहीं मिलना चाहती। मुझे आरुषि को मम्मी से मिलवाना है। तुम समझ सकते हो ना, इस वक़्त हमारी फैमिली किस हालात से गुज़र रही है।”

आस्तिक ने गुस्से में कहा — “हां, अच्छी तरह समझ रहा हूं। और यह भी समझ रहा हूं कि तुम उस बहन से मिलने के लिए जा रही हो जिसने तुम्हें जान से मारने की कोशिश की, तुम्हारा इतना बड़ा एक्सीडेंट करवाया था! देखो अरुणिमा, मैं पहले तुम्हें एक बार खो चुका हूं और अपने बच्चों को भी खो चुका हूं। मैं दोबारा उस लड़की की वजह से हमारी हंसी-खुशी की ज़िंदगी में फिर से कोई प्रॉब्लम नहीं चाहता हूं!”

अरुणिमा उसकी फ़िक्र समझ सकती थी। उसने आस्तिक का हाथ पकड़ते हुए कहा — “इस बार कुछ भी नहीं होगा। मैं प्रॉमिस करती हूं तुमसे — तुम्हारी अरुणिमा और तुम्हारा बच्चा जैसे जा रहे हैं वैसे ही वापस आएंगे। लेकिन मेरा अपनी बहन से मिलना बहुत ज़रूरी है। मुझे यह तो याद नहीं कि उसने पहले मेरे साथ कितना ग़लत किया या क्यों वह मुझसे नफ़रत करती थी, लेकिन जब उसने मुझसे माफ़ी मांगी तो मुझे उसकी आंखों में सच्चाई नज़र आई। पर फिर भी मैं उसे माफ़ नहीं कर सकी, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी वजह से मैंने अपने बच्चों को खोया था। पर तुम खुद भी तो सोचो, आस्तिक — उसने एक बार कहने पर सरेंडर कर दिया और खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। लेकिन उसकी बीमारी का पता चलने के बाद मुझे बहुत दुख हुआ। और मम्मी भी उसकी बीमारी जानकर बहुत परेशान हो गई हैं। वह एक बार आरुषि से मिलना चाहती हैं, उसे देखना चाहती हैं कि उनकी दूसरी बेटी कैसी है। प्लीज हमें मत रोको।”

आस्तिक ने आँखें बंद कीं और माथा पीट लिया। अरुणिमा के आगे वह हमेशा हार जाता था। लेकिन उसने गुस्से में कहा — “ठीक है, तुम जेल जाना चाहती हो उससे मिलने के लिए, तो जा सकती हो। लेकिन तुम अकेली नहीं जाओगी। मेरी सिक्योरिटी तुम्हारे साथ जाएगी और इस बार मैं कोई बहाना नहीं सुनूंगा। तुम चुपचाप उससे मिलो और अगले ही पल वापस आ जाओ। उसके साथ बैठकर बहन-मिलाप मत करने लगना।”

अरुणिमा ने मुस्कुराते हुए हामी भरी। उसके बाद वह आशा जी और बृजेश जी के साथ आस्तिक की प्राइवेट कार में सेंट्रल जेल के लिए निकल जाती हैं। जैसे ही वे वेटिंग रूम में पहुंचती हैं, उनका मिलने का समय पहले से ही तय था क्योंकि यह महिलाओं की जेल थी, तो यहां पर महिला कर्मचारी ही थीं।

अरुणिमा, आशा जी और बृजेश जी वेटिंग एरिया में बैठे थे। जब वेटिंग एरिया का दरवाज़ा खुला तो कैदी के कपड़ों में आरुषि अंदर आई। जैसे ही आरुषि ने चेहरा उठाकर सामने देखा तो अरुणिमा को देखकर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई और माँ ने भी उसे देखकर एक फीकी सी मुस्कान दी, लेकिन वे आगे नहीं बड़ी—आरुषि के दोनों हाथों में हथकड़ी थी।

वो आगे बढ़कर अरुणिमा से मिलने ही वाली थी कि तभी उसकी नज़र कमरे में मौजूद दो और लोगों पर गई: बृजेश जी और आशा जी। उन्हें देखकर आरुषि के कदम रुक गए और उसकी आँखों में एकदम से आँसू आ गए। वो अपने माता-पिता को इतने सालों बाद देख रही थी और वे भी आरुषि को इतने सालों बाद देख रहे थे। आशा जी का मन इतना भारी हो गया था कि वे खुद को रोक नहीं पाईं; वे जल्दी से आगे बढ़कर आरुषि को ज़ोर से गले से लगा बैठीं, जबकि आरुषि के दोनों हाथ हथकड़ी में बँधे हुए थे। आशा जी ने कसकर अपने दोनों हाथ आपस में ले लिए और अपनी आँखें बंद कर लीं।

आशा जी आरुषि को गले लगाकर रोने लगीं और आरुषि के भी आँसू निकल आए। उसने बहुत रोकने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार आँसू निकल ही गए। बृजेश जी भी पास आए। उनकी भी आँखों में नमी थी और ये नज़ारा देखकर अरुणिमा की आँखें भी भीग गईं। यहाँ तक कि वो कांस्टेबल जो आरुषि को लेकर आई थी, उसकी भी आँखों में आँसू आ गए थे।

आशा जी काफ़ी देर आरुषि के गले लगी रहीं। बृजेश जी ने आरुषि के माथे पर हाथ रखा और उसे सहलाने लगे। आरुषि ने काश अपनी आँखें बंद कर लीं—अपनी नफ़रत की वजह से उसने कितना कुछ खोया था: अपने माता-पिता का अपनापन, उनका प्यार। आरुषि को वो दिन याद आने लगे जब उसका परिवार उससे प्यार किया करता था और उसकी परवाह किया करता था, पर अरुणिमा से नफ़रत की वजह से उसने अपने माता-पिता की भी परवाह नहीं की। आशा जी रोते हुए आरुषि से अलग हुईं; उन्होंने आरुषि का चेहरा अपने हाथों में लिया और सहलाते हुए कहा, "आरुषि, मेरी बच्ची..."

आरुषि ने काश अपनी आँखें बंद कर लीं; आँसुओं की धार उसके गले पर आ चुकी थी। उसने अरुणिमा को देखते हुए बोला, "मैंने तुम्हें मना किया था... मम्मी-पापा को यहाँ लाने के लिए।"

अरुणिमा ने आँसू पोछे और आरुषि के पास आते हुए कहा, "तुम भी तो मेरी बात नहीं मानती हो, तो मैं तुम्हारी बात क्यों मानूँ?"

आशा जी ने आरुषि को कुर्सी पर बिठाया और अपने बैग से फ्राइड राइस निकाली जो उन्होंने घर से बनाकर लाई थी। आरुषि ने सालों बाद फिर से वही खुशबू महसूस की जो उसने बचपन में महसूस की थी। बचपन में फ्राइड राइस उसे बहुत पसंद था और आशा जी वही फ्राइड राइस बनाती थीं। अपनी माँ के हाथों से एक बार फिर फ्राइड राइस खाकर आरुषि के आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

बृजेश जी बार-बार अपना चश्मा उतार कर आँसुओं को पोंछ रहे थे। अरुणिमा के लिए भी ये पल बहुत भावुक था—अपने माता-पिता से मिलकर आरुषि का मन जितना भारी हुआ था, उतना ही हल्का भी हुआ था। उसने अपनी सारी ग़लतियों के लिए माफ़ी माँगी और उन दोनों ने आरुषि को माफ़ भी कर दिया था।

आरुषि ने बताया कि उसने अरुणिमा से नफ़रत क्यों की थी। जब पहली बार वो दोनों घर में आई थीं तो माहौल में ढलने में उन्हें समय लग रहा था। तब पहली बार बृजेश जी अपने साथ एक विदेशी गुड़िया लेकर आए थे, जो उन्होंने सिर्फ़ अरुणिमा को दी थी। ये चीज़ आरुषि ने खिड़की के बाहर से देख ली थी और उसी दिन से वो अरुणिमा से नफ़रत करने लगी। उसके बाद उसे हर चीज़ में अरुणिमा बेहतर लगने लगी और माता-पिता का लगाव भी अरुणिमा की तरफ़ दिखाई देता था। इसलिए उसने गुस्से में आकर अरुणिमा की गुड़िया जला दी।

अरुणिमा को ये बात याद नहीं थी क्योंकि वो अपना पिछला सब कुछ भूल चुकी थी जो बचपन में हुआ था, लेकिन आशा जी और बृजेश जी को याद था। आशा जी ने आरुषि से कहा, "तुम पागल हो गई थी क्या? गुड़िया के लिए तुमने अरुणिमा से नफ़रत करना शुरू कर दिया?" आशा जी ने आरुषि को बताया कि वो गुड़िया आरुषि के लिए ही थी। बृजेश जी ने कहा, "हाँ, वो गुड़िया तुम्हारे लिए ही थी। हमने उसे अरुणिमा को दिया था ताकि वो उसे गिफ़्ट पैक कर सके—तुम भूल गई। उस समय तुमने अपनी क्लास में सबसे अच्छा रैंक लाया था, हम लोग तुम्हें कुछ देना चाहते थे। तब अरुणिमा ने कहा था कि तुम्हें गुड़िया बहुत पसंद है; मैंने स्पेशली वो गुड़िया तुम्हारे लिए ऑर्डर करवाई थी और उसे अरुणिमा को दिया था ताकि वो उसे पैक कर सके, लेकिन जब हम गुड़िया लेने गए तो वो वहाँ से ग़ायब हो चुकी थी।"

आरुषि एकदम हैरान हो गई—एक ग़लतफ़हमी की वजह से वो इतने साल तक अपने परिवार से नफ़रत कर रही थी। ये सोचकर वो खुद को और अधिक दंड देना चाहती थी। मिलने का समय लगभग ख़त्म हो रहा था और अभी अरुणिमा और आरुषि ने एक-दूसरे से बात नहीं की थी।

आशा जी और बृजेश जी आरुषि से मिलकर बाहर चले गए ताकि अरुणिमा उनसे बात कर सके। अरुणिमा आरुषि के पास आई और कहने लगी, "डॉक्टर का फ़ोन आया था—तुम अपना इलाज क्यों नहीं करवा रही? डॉक्टर तुम्हें टेस्ट के लिए ले जाना चाहते हैं, पर तुम जाना ही नहीं चाहती और दवाइयाँ भी समय पर नहीं ले रही हो।"

आरुषि ने एक थमी हुई मुस्कान के साथ अरुणिमा को देखकर कहा, "तुम क्यों चाहती हो कि मैं ठीक हो जाऊँ, जबकि तुम जानती हो कि मैं ठीक नहीं हो सकती। ये थर्ड स्टेज कैंसर है—चाहे मैं कुछ भी करवा लूँ, ठीक नहीं होगा। एक न एक दिन मुझे जाना होगा। तो फिर दवाइयों पर और टेस्ट करवा कर मैं अपना और लोगों का समय बर्बाद क्यों करूँ और किसी को उम्मीद क्यु दूँ?"

अरुणिमा ने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे से, उसी की तरह देखते हुए कहा, "ऐसा नहीं है..."

और उसने कहा कि वे जानते हैं कि कैंसर का इलाज बहुत मुश्किल है और जिस स्टेज पर तुम हो, उसे स्टेज पर नामुमकिन माना जाता है, लेकिन फिर भी वे चाहते हैं कि तुम अपना इलाज कराओ। "मैंने अब तक मम्मी-पापा को कुछ नहीं बताया है। वे हमारी जेल में होने की बात से ही बहुत परेशान हो गए थे। अगर मैंने उन्हें तुम्हारी बीमारी के बारे में बता दिया होता तो वे और ज़्यादा टूट जाते।"

आरुषि की आँखों से आँसू बह रहे थे; उसने अपने आँसुओं को पोंछते हुए कहा, "एक बात बताओ—अगर मैंने इलाज करवाया और अगर मैं ठीक हो गई तो क्या तुम मुझे माफ़ करोगी?"

अरुणिमा ने अपना चेहरा नीचे कर लिया; उसका जवाब था नहीं—वो अपने बच्चों के कातिल को कभी माफ़ नहीं करेगी।

आरुषि ने एक व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ सिर हिलाया और कहा, "मुझे पता है कि तुम मुझे कभी माफ़ नहीं करोगी। इसलिए मैं ठीक नहीं होना चाहती। ये ज़िंदगी अब बोझ लगने लगी है। पर फिर भी मैं तुमसे यही कहूँगी—मैंने सूर्य को तुम्हारा एक्सीडेंट कराने को नहीं कहा था। पर मैं इस सज़ा को स्वीकार करती हूँ क्योंकि मैंने जो तुम्हारे साथ किया वो सच्ची माफ़ी के लायक नहीं है। मैं सज़ा भुगतना चाहती हूँ, इसलिए मैंने अपने आप को क़ानून के हवाले कर दिया है। पर कहीं न कहीं एक्सीडेंट के ज़िम्मेदार मैं ही हूँ, क्योंकि सूर्य मुझे खुश करना चाहता था—वो चाहता था कि ये सारा मामला एक बार में ही ख़त्म हो जाए; इसलिए उसने बिना सोचे समझे तुम्हारा एक्सीडेंट करवा दिया।

मुझे नहीं पता था कि तुम प्रेग्नेंट थी। इसलिए जब सूर्य ने मुझे बताया कि उसने तुम्हें जान से मारने की कोशिश की—जिससे तुम तो बच गईं पर तुम्हारे बच्चे नहीं बच पाए—तो मुझे बहुत गुस्सा आया। मैं सिर्फ़ तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहती थी, जान से मारना नहीं। इसीलिए मैंने सूर्य से अपने रिश्ते ख़त्म कर दिए, पर वो फिर भी तुम्हारे पीछे पड़ा रहा। जब मुझे पता चला कि उसने होटल के बाथरूम में तुम्हारे साथ बलात्कार की कोशिश की, तो मैं अपने गुस्से पर क़ाबू नहीं रख सकी और मैंने उसे जान से मार दिया। मुझे इसकी सज़ा मिलनी चाहिए। अरुणिमा, मुझे तुम्हें तकलीफ़ देने, तुम्हारे बच्चों की मौत की ज़िम्मेदार बनने और सूर्य की मौत की सज़ा मिलनी चाहिए—और इन सब की एक ही सज़ा है कि मुझे इस पाप भरी ज़िंदगी से मुक्ति मिल जाए।"

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Deepika Sarkar

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