
आरुषि गुस्से में उन दोनों को देखते हुए बोली, "हाँ, मैंने ही मारा है सूर्य को और मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं है। वह करने के लायक ही था, अच्छा हुआ जो मैंने उसे मार दिया।" आरुषि उस वक़्त एक निर्दयी राक्षसी जैसी लग रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे उसे सच में इस बात का कोई अफ़सोस नहीं, जैसे सूर्य को मारकर उसने कोई जुर्म नहीं किया हो।
आस्तिक ने अरुणिमा को अपनी बाहों में लेते हुए कहा, "अगर ऐसी बात है, तो फिर तुम सरेंडर क्यों नहीं कर देती हो?"



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