
अरुणिमा हॉस्पिटल के बेड पर अभी भी सुन्न बैठी हुई थी। उसके कानों में पुष्कर जी की बातें अभी भी गूंज रही थीं। उनके शब्द एक-एक करके अरुणिमा के दिमाग को इस तरीके से घेर लेते हैं कि अरुणिमा अब कुछ और सोच ही नहीं पा रही थी। पिछले आधे घंटे से वो बेड पर ऐसी ही बैठी हुई थी, उसकी न तो पलकें झपक रही थीं और न ही वो कुछ रिएक्ट कर रही थी। सांस तो चल रही थी, लेकिन वो कुछ प्रतिक्रिया ही नहीं दे रही थी। तभी उसके कानों में कदमों की आहट आई।



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