
आस्तिक अपने दिल और दिमाग के बीच की जंग में फँसा हुआ था। उसका दिल कुछ कह रहा था, और दिमाग उसे भ्रमित कर रहा था। यह दुविधा उसे समझ नहीं आ रही थी; क्या करे और किसकी बात सुने, यह निर्णय ले पाना उसके लिए मुश्किल था। वह अपने दिल और दिमाग की आवाज़ ही ठीक से नहीं सुन पा रहा था, ऊपर से अरुणिमा की आहें सुनकर वह और भी हैरान हो गया। अरुणिमा नींद में कुछ बड़बड़ा रही थी, कुछ कहने की कोशिश कर रही थी।
आस्तिक जल्दी से अरुणिमा के पास गया। उसने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "अरुणिमा, अरुणिमा! क्या हुआ? तुम ठीक तो हो, ना? किससे बात रही हो?"



Write a comment ...