
अरुणिमा को अंधेरे कमरे में घुटन हो रही थी। बहुत तेज प्यास भी लग रही थी। उसका पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था और वह कुर्सी से बुरी तरह बंधी हुई थी। उसकी साँसें बेकाबू चल रही थीं और ऐसा लग रहा था जैसे यहाँ बंधे हुए उसे सदियाँ बीत चुकी हों। वह यहाँ से निकलने के लिए तड़प रही थी, छटपटा रही थी और खुद को खोलने की मिन्नत कर रही थी, पर वहाँ उसकी मिन्नत सुनने वाला कोई नहीं था... या यूँ कहें कि अगर कोई था भी, तो उसने यह जरूरी नहीं समझा कि उसकी आवाज़ सुने।
कई घंटों तक चिल्लाने के बाद अरुणिमा बुरी तरह थक चुकी थी और उसकी साँसें भी जवाब देने लगी थीं। उसने हताश होकर अपनी आँखें बंद कर लीं। अंधेरे कमरे में रोशनी का कोई भी जरिया नहीं दिख रहा था और धीरे-धीरे अंधेरा और भी गहराता जा रहा था। तभी उसने अपने कानों में कदमों की आहट सुनी। वह थोड़ी चौंक गई। कोई तेजी से इस बदबूदार, सीलन भरे कमरे की ओर बढ़ रहा था। यह महसूस करते ही अरुणिमा का दिल जोरों से धड़कने लगा। तभी एक तेज आवाज के साथ कमरे का दरवाजा खुल गया।



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