
अरुणिमा किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी। आस्तिक उसके सामने एक डरावने इंसान की तरह नज़र आ रहा था। उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो चुकी थीं और चेहरा जकड़ गया था। उसके हाथों में उसकी पिस्तौल थी। उसने अभी-अभी उस आदमी की हत्या कर दी थी जो अरुणिमा के साथ बदतमीज़ी कर रहा था।
आस्तिक अपनी गाड़ी में आया था। उसे लगा था कि अरुणिमा शायद बहुत दूर चली गई होगी, इसलिए वह गाड़ी लेकर निकला था। लेकिन जैसे ही वह फार्महाउस से थोड़ा आगे पहुँचा, उसे अरुणिमा सड़क के किनारे दिख गई—और साथ ही वो शख्स भी, जिसकी उसने जान ली थी। जब उसने देखा कि उस आदमी ने अरुणिमा का हाथ पकड़ा हुआ है, तो आस्तिक के दिल में एक अजीब सी आग लग गई। उसने बिना सोचे-समझे गाड़ी साइड में रोकी। अगले ही पल वह गाड़ी से उतरा और सीधे जाकर उस आदमी को गोली मार दी। उसे यह पूछने की भी ज़रूरत नहीं लगी कि वह कौन है और अरुणिमा के साथ क्या कर रहा है। उसके लिए तो बस इतना ही काफी था कि उसने अरुणिमा का हाथ पकड़ा था।



Write a comment ...