
एक माँ के एहसास को अनुभव करना अपने आप में एक अलग अनुभव होता है। ये कुछ ऐसा है जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। नम्रता जी की बातें अरुणिमा बहुत ध्यान से सुन रही थी। जो वो कह रही थीं, वो ऐसा लग रहा था जैसे कोई बुजुर्ग औरत किसी दूसरी औरत को आने वाले बच्चे के बारे में समझा रही हो। सच में? अरुणिमा के मुँह से ये निकल गया, जैसे कि वो इन सब पर सच में यकीन करना चाहती थी।
उसकी बात सुनकर निशा मुस्कुराते हुए अरुणिमा को देखती है और कहती है, "बिल्कुल अरुणिमा, मैं गलत नहीं कह रही हूँ। माँ बनने का एहसास ही कुछ ऐसा होता है जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। वैसे तो कभी-कभी ये थोड़ा सा इरिटेटिंग लग सकता है… क्योंकि प्रेगनेंसी का पीरियड ऐसा होता है कि तुम्हें अकेले ही सब कुछ झेलना पड़ता है। उस वक्त जब कोई तुम्हारे आसपास न हो, तो इतना गुस्सा आता है और इतनी चिड़चिड़ाहट होती है कि मन करता है किसी का सिर फोड़ दूँ।"



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