
लावण्या अभी भी किचन में अरुणिमा के सामने खड़ी थी और गुस्से में उसे घूर रही थी, जब अरुणिमा ने उसकी तुलना एक बाज़ारू औरत से कर दी। लावण्या गुस्से में कुछ कहना चाहती थी। उसने उंगली दिखाकर अरुणिमा से कहा, "बहुत अकड़ है ना तुम्हें? बहुत ज़ुबान चलती है तुम्हारी! आस्तिक के सामने तो ये ज़ुबान नहीं चलती, उसके सामने तो भीगी बिल्ली बनकर रहती हो!"
अरुणिमा ने उसकी बकवास सुनी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर कोई भी एक्सप्रेशन नहीं आया। वो उसे देखते हुए बोली, "हाँ, मैं आस्तिक के सामने ज़्यादा नहीं बोलती... क्योंकि मुझे उसके सामने बोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। आस्तिक मेरी बातें बिना कहे ही समझ जाता है। लेकिन तुम्हारा क्या? आस्तिक ने तो खुद तुम्हें सामने से बुलाया है, फिर भी तुम अपनी अदाओं से उसे इंप्रेस नहीं कर पा रही हो। उसे हर वक्त मेरी ही ज़रूरत होती है, यहाँ तक कि वो मुझे ही अपने पास चाहता है। और तुम... उसके पास इतने छोटे और रिवीलिंग कपड़े पहनकर जाती हो, फिर भी उसने तुम्हारी तरफ देखा तक नहीं!



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