
बोर्ड के दरवाज़े पर खड़ी अरुणिमा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। वह उम्मीद लगाए बैठी थी कि शायद यह दरवाज़ा खुल जाए और उसकी माँ एक बार फिर उसे बचपन के उन दिनों में ले जाए, जब वह उसकी परवाह करती थी, उससे प्यार करती थी। उस दरार को, जो उनके रिश्ते में आ गई थी, वह हमेशा-हमेशा के लिए मिट जाए...
कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसे पल आते हैं जब हम सोचते हैं कि काश हमारे पास एक टाइम मशीन होती और हम समय में पीछे जा पाते। अगर ऐसा होता तो जो चीज़ें खराब हुई हैं, उन्हें सुधार लेते। अरुणिमा अपनी ज़िंदगी में उस दिन जाना चाहती थी जब उसने आस्तिक से शादी के लिए हाँ कही थी... वह बस अपनी पूरी ज़िंदगी में उस दिन को सुधारना चाहती थी; उसे जीना ही नहीं चाहती थी... अगर ऐसा होता तो सब कुछ ठीक होता। वह अपने माता-पिता के साथ होती, सब लोग पहले की तरह ही रहते। पर अफ़सोस, ऐसा कुछ नहीं हो सकता। यह सब हमारी कल्पना ही हो सकती है, इसके अलावा और कुछ भी नहीं। जो बीत गया, वह बीता हुआ वक्त ही था—ना उसे सुधारा जा सकता है, ना बदला जा सकता है।



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