
मेरी आँखों के सामने अंधेरा ही अंधेरा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही हो। सिवाय अंधेरे के, मुझे और कुछ नज़र नहीं आ रहा था। तभी एक रोशनी ने मेरी आँखों पर प्रहार किया, और इसी के साथ मेरी आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं। ऐसा लग रहा था, जैसे मैं गहरी नींद में थी और मेरे शरीर को किसी भारी पत्थर से बाँधकर जकड़ लिया गया हो। पर जब धीरे-धीरे मेरी पलकों ने खुलना शुरू किया, तब जाकर मेरा सामना रोशनी से हुआ। मैं धीरे-धीरे अपनी आँखें फड़फड़ाते हुए बेहोशी की हालत से बाहर आने लगी। मैंने देखा कि मैं इस वक़्त लेटी हुई थी, क्योंकि मुझे अपने ऊपर छत नज़र आ रही थी। छत पर सुंदर नक्काशियाँ बनी थीं और बीचो-बीच शानदार झूमर लगा हुआ था।
मुझे अजीब लग रहा था, क्योंकि मेरे शरीर पर वो भारीपन अभी भी महसूस हो रहा था।



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