
पार्टी में पूरी तरह शामिल होने के बावजूद, अरुणिमा और आस्तिक के चेहरों पर वही बनावटी मुस्कान बनी हुई थी। वे केवल औपचारिकताएँ निभा रहे थे। लोगों के बीच पहुँचकर, अरुणिमा ने सबको देखकर हाथ हिलाया, और सभी ने उसे देखकर तालियाँ बजाईं। आस्तिक ने भी सभी को देखकर हाथ हिलाकर अभिवादन किया। तभी अरुणिमा की नज़र आस्तिक के माता-पिता पर पड़ी—मिस्टर पुष्कर रायचंद और उनकी पत्नी नेहा रायचंद।
पुष्कर जी ने इस मौके पर खूबसूरत सफ़ारी सूट पहना हुआ था, जबकि नेहा जी ने बनारसी साड़ी के ऊपर भारी सोने का सेट पहना था। भले ही नेहा जी की उम्र अब दादी बनने वाली थी, लेकिन उनके चेहरे पर ऐसी चमक और रौनक थी कि कोई नहीं कह सकता था कि उनकी उम्र हो चुकी है।
आस्तिक और अरुणिमा पुष्कर जी और नेहा जी के पास पहुँचे। आस्तिक अपने पिता के गले लगा और माँ के भी। अरुणिमा मुस्कुराते हुए उनके पास गई और झुककर उनके पैर छूने लगी। पुष्कर जी ने उसे बीच में रोकते हुए उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "क्या कर रही हो? यह सब करने की ज़रूरत नहीं है।"
पुष्कर जी का व्यवहार थोड़ा सख्त ज़रूर था, लेकिन उनका स्वभाव सभी के लिए ऐसा ही था। हालाँकि आस्तिक के लिए वे थोड़े कोमल थे, लेकिन बाकियों के सामने उनका वही रौबदार रूप देखने को मिलता था। पुष्कर जी को देखकर लोग अक्सर कहते थे कि आस्तिक का घमंड उन्हीं से आया है। उनके ऐसा कहने पर अरुणिमा ने बुरा नहीं माना, बल्कि मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया। इसके बाद वह नेहा जी की ओर देखती है।
नेहा जी मुस्कुराते हुए अरुणिमा के पास आईं और उसे गले लगाकर बोलीं, "बहुत-बहुत मुबारक हो, मेरी बच्ची। शादी की पहली सालगिरह आप दोनों के जीवन में ढेर सारी खुशियाँ लेकर आए।"
अरुणिमा मुस्कुराते हुए नेहा जी को देखती है। पुष्कर जी और आस्तिक एक तरफ़ होकर कुछ बात कर रहे थे, जबकि नेहा जी अरुणिमा के साथ खड़ी थीं। उन्होंने अरुणिमा का हाथ पकड़ते हुए कहा, "अरुणिमा, धन्यवाद बच्चा। मैं बहुत खुश हूँ कि तुमने आखिरकार अपना वादा निभाया। मेरा बेटा तुम्हारे साथ अपनी शादी निभा रहा है। मैं जानती थी कि तुम मेरे बेटे के लिए सही इंसान हो। धन्यवाद, अरुणिमा, मेरे बेटे की ज़िंदगी संवारने के लिए।"
नेहा जी की बातों में उनकी खुशी झलक रही थी, लेकिन अरुणिमा की मुस्कान उतनी ही झूठी थी। उसका मन कर रहा था कि नेहा जी को सारी सच्चाई बता दे, लेकिन उसे पता था कि सच्चाई जानकर उनका दिल टूट जाएगा और जो विश्वास उन्होंने अरुणिमा पर किया है, वह भी खत्म हो जाएगा।
और वैसे भी अरुणिमा क्या बताएगी नेहा जी को? क्या यह कि उसकी शादी की सच्चाई कुछ और है? वह सारा दिन घर में एक सामान की तरह पड़ी रहती है। उसे कोई काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, लेकिन फिर भी उसकी हालत घर में रखी निर्जीव चीज़ से भी बदतर है।
अरुणिमा की ज़िंदगी राजकुमारी की तरह हो गई थी, जिसे एक महल में बंद कर दिया गया हो। भले ही अंदर सारी सुख-सुविधाएँ मौजूद थीं, लेकिन उसके पास जो चीज़ नहीं थी, वह थी आज़ादी। एक साल हो गया था, अरुणिमा ने इस कैद को सहन किया था। उसे खुद नहीं पता कि यह सब कब तक चलेगा।
"अरुणिमा, आस्तिक तुम्हारे साथ ठीक से पेश आता है, न?" नेहा जी ने अरुणिमा से पूछा। यह सुनकर अरुणिमा की मुस्कान हल्की पड़ गई, लेकिन वह चुप रही। इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, एक ठंडा हाथ उसकी कमर पर आकर उसे कसकर अपने करीब कर लेता है। अरुणिमा इस महक से पहचान गई थी कि यह हाथ आस्तिक का ही है।
"मॉम, आप मेरी पत्नी को मेरे खिलाफ़ भड़का रही हैं? कमाल है। मैंने तो सुना था कि शादी के बाद सास-बहू की बनती नहीं है, पर यहाँ तो दृश्य ही उल्टा है। आप क्या चाहती हैं? यहाँ से वापस जाने के बाद मेरा और मेरी पत्नी का झगड़ा हो?" आस्तिक ने थोड़े दबंग अंदाज़ में कहा।
आस्तिक की बात सुनकर नेहा जी जल्दी से बोलीं, "अरे नहीं, आस्तिक। ऐसी कोई बात नहीं है। तुम गलत सोच रहे हो। मैं तो बस यह जानना चाहती थी कि तुम और अरुणिमा एक साथ खुश तो हो, न।"
"हाँ, बिल्कुल मॉम। हम एक साथ बहुत खुश हैं। क्यों, जान?" आस्तिक ने अरुणिमा को अपने और करीब करते हुए पूछा। अरुणिमा ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा, "जी, मम्मी जी। आपको फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। हम दोनों बहुत खुश हैं।"
नेहा जी को तसल्ली हो गई और उन्होंने सिर हिला दिया। तभी उनकी एक दोस्त वहाँ आ गई। नेहा जी आस्तिक और अरुणिमा को एक साथ छोड़कर अपनी दोस्त के पास चली गईं। उनके जाते ही, आस्तिक ने अरुणिमा की कमर से हाथ हटाया और कड़वी मुस्कान के साथ उसकी ओर देखते हुए कहा, "काफ़ी अच्छी एक्टिंग कर लेती हो। अच्छी बात है। जब तक पार्टी ख़त्म नहीं होती, यह एक्टिंग जारी रखना।"
यह कहते हुए आस्तिक अरुणिमा को वहीं छोड़कर अपने पिता के पास चला गया, जहाँ उनके पिता बिज़नेस पार्टनर्स के साथ कुछ बात कर रहे थे। आस्तिक भी उन लोगों के बीच शामिल हो गया।
थोड़ी देर बाद नेहा जी अरुणिमा को सोसाइटी की कुछ और महिलाओं से मिलवाने लगीं। अरुणिमा को उनसे मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह बस नेहा जी के साथ औपचारिकताएँ पूरी कर रही थी।
तभी अरुणिमा के कानों में काँच की आवाज़ सुनाई दी और वह अपना चेहरा घुमाकर देखती है। इस समय सामने बेला खड़ी थी, जिसने एक शिमरी वन-पीस ड्रेस पहनी हुई थी। वह अपने हाथों में वाइन का गिलास लेकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। जब सब उसकी ओर देखने लगे, तो वह मुस्कुराते हुए एक कुर्सी पर चढ़ जाती है और वाइन का गिलास हवा में उठाते हुए कहती है, "ध्यान दीजिए, महिलाओं और सज्जनों! जैसा कि आप सब जानते हैं, आज की रात हमारे परिवार के लिए बहुत ख़ास है। दरअसल, आज मेरे बड़े भाई आस्तिक रायचंद की शादी की पहली सालगिरह है। तो चलिए, हम सब मिलकर उनकी इस रात को और खूबसूरत बनाते हैं!"
"चीयर्स, भाई!" ऐसा कहते हुए बेला ने अपने हाथ में पकड़े हुए वाइन के गिलास को आस्तिक की ओर हवा में लहराया। इसी के साथ वहाँ खड़े सभी लोगों ने अपने हाथ में पकड़े हुए शैंपेन, वाइन और अल्कोहल के गिलास को हवा में लहराते हुए आस्तिक को देखकर चीयर्स किया। आस्तिक ने भी मुस्कुराते हुए अपने हाथ के शैंपेन गिलास को हवा में उठाकर सभी का अभिवादन किया।
दिखावे के लोग और दिखावे की दुनिया। पार्टी में कुछ लोगों की मुस्कान सच्ची थी, लेकिन बाकी सबके चेहरों पर नकली मुखौटे लगे हुए थे। अरुणिमा इन सबके चेहरे देखकर उनके भाव पहचान गई थी। वैसे रायचंद परिवार भी दिखावा करने में पीछे नहीं था।
अरुणिमा से भी महँगे कपड़े इस वक़्त बेला ने पहने हुए थे, जो आदमियों के बीच अपने हुस्न का प्रदर्शन बखूबी कर रही थी। बेला के लिए शुरुआत में ही बता दूँ कि अगर एक तरफ़ जहरीला साँप हो और दूसरी तरफ़ बेला हो, तो आप लोग साँप पर भरोसा कीजिएगा, लेकिन बेला पर नहीं। इस लड़की के अंदर एक अलग ही जहरीली चालाकी छुपी है। और हो भी क्यों ना? इसके अंदर खून तो इसकी माँ का ही है।
अब यह बात भी जान लीजिए कि बेला, नेहा जी की बेटी नहीं है। वह आस्तिक की सौतेली बहन है। मिस्टर पुष्कर रायचंद ने अपने जीवन में खूब आशिकियाँ की थीं। ऐसी ही एक आशिकी उन्होंने अपनी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त यानी नेहा जी की सहेली मालिनी के साथ भी की थी।
मालिनी और नेहा बचपन से एक साथ पली-बढ़ी थीं। मालिनी नेहा जी के ड्राइवर की बेटी थी, लेकिन वह हमेशा नेहा जी के पैसे और रुतबे से जलती थी। नेहा जी ने उसे अपनी बहन की तरह माना था, लेकिन मालिनी ने हमेशा नेहा की किस्मत को कोसा। उसकी नफ़रत तब और बढ़ गई, जब नेहा की शादी पुष्कर रायचंद से हो गई।
नेहा जी की किस्मत और खुशहाल ज़िंदगी देखकर मालिनी के मन में जलन और ज़्यादा बढ़ गई। उसे पता चला कि पुष्कर जी रंगीन मिजाज़ के आदमी हैं। अपनी ज़रूरतें पूरी करने और अपनी नफ़रत का बदला लेने के लिए मालिनी ने पुष्कर जी को अपने जाल में फँसा लिया। पुष्कर जी, जो पहले ही विवाहेतर संबंधों के लिए कुख्यात थे, मालिनी के जाल में फँस गए।
मालिनी ने अपनी चालाकी से नेहा जी को यकीन दिलाया कि वह उनकी गर्भावस्था के दौरान उनका ध्यान रखने आई है। लेकिन हकीकत यह थी कि मालिनी और पुष्कर रातों को एक-दूसरे के साथ रंगीन वक़्त बिताते थे। नेहा जी के दूध में नींद की गोलियाँ मिलाकर वे उन्हें सुला दिया करते थे, और फिर पुष्कर मालिनी के साथ अपनी रातें बिताते थे।
इस तरह मालिनी ने नेहा जी के भरोसे का ग़द्दारी करते हुए रायचंद परिवार के अंदर एक गहरी साज़िश की नींव रख दी थी।
पर उनका यह खेल ज़्यादा दिन तक नहीं चल पाया। जब आस्तिक पैदा हुआ और उसके छह महीने बाद ही मालिनी को अपनी गर्भावस्था का पता चला, तो वह बहुत डर गई थी। उसके पास जाने के लिए और कोई जगह नहीं थी, और पुष्कर उसे दुनिया के सामने अपनाने वाला नहीं था। उसने साफ़-साफ़ कह दिया था कि वह चाहे तो गर्भपात करवा सकती है, लेकिन दुनिया की नज़रों में नेहा ही उसकी पत्नी रहेगी और आस्तिक ही उनका बेटा रहेगा। उसके लिए अपनी आत्मसम्मान से बढ़कर और कुछ भी नहीं था।
तब मालिनी को एहसास हुआ कि पुष्कर जैसा इंसान कभी भी भरोसे के लायक नहीं था। उसने पुष्कर के साथ उम्मीद बाँधकर ही गलती की थी। इसलिए मालिनी ने नेहा से मदद की उम्मीद की। जब नेहा को इस बारे में पता चला, तो वह टूट गई थी। वह इतनी ज़्यादा परेशान हो गई और अंदर ही अंदर इतनी टूटकर बिखर गई थी कि उसने अपनी जान लेने की भी कोशिश की। लेकिन अपने बच्चों की आवाज़ सुनकर नेहा ने खुद को ख़त्म करने का इरादा छोड़ दिया।
उस दिन के बाद से ना तो उसने मालिनी की ओर देखा और ना ही पुष्कर जी के साथ वह सामान्य तरीके से रही। पुष्कर जी के चेहरे पर अपराधबोध का एक भी भाव नहीं था। उन्होंने जो किया था, उसका उन्हें एक भी पछतावा नहीं था। वे हमेशा नेहा से यही कहा करते थे कि वे अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जिएँगे।
नेहा की पूरी ज़िंदगी वीरान हो गई थी। उनके पति उनके होकर भी उनके नहीं हो पाए थे। वे बस आस्तिक के लिए जी रही थीं। नेहा, आस्तिक को लेकर पुष्कर से अलग हो गई।
पर शायद उनकी ज़िंदगी की तकलीफ़ें ख़त्म होना अभी बाकी थीं। मालिनी ने अपनी डिलीवरी के वक़्त जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, लेकिन बच्चों के जन्म के दौरान वह गुज़र गई। जाने से पहले उसने सिर्फ़ नेहा के सामने ही मदद की उम्मीद की थी, क्योंकि पुष्कर से तो उसे कोई उम्मीद थी ही नहीं। वह जानती थी कि पुष्कर जितना क्रूर और कठोर दिल का इंसान है, नेहा उतनी ही कोमल दिल और सच्ची इंसान है। इसलिए उसने अपनी दोस्त को दोस्ती का वादा देकर अपने बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी दी।
मालिनी के गुज़रने के बाद नेहा का दिल पिघल गया। उन मासूम बच्चों की इसमें कोई गलती नहीं थी। मालिनी ने एक बेटा और एक बेटी को जन्म दिया था और उनकी ज़िम्मेदारी नेहा पर डालकर चली गई थी। एक औरत होने के नाते नेहा शायद मुँह फेर लेती, लेकिन एक माँ होने के नाते वह इन मासूमों को अनदेखा नहीं कर पाई।
इसके बाद नेहा ने पुष्कर के सामने एक शर्त रखी कि वह उनके पास वापस आ जाएगी और उनकी सभी शर्तों के हिसाब से ज़िंदगी जिएगी, लेकिन दुनिया के सामने मालिनी के बच्चों को अपनाना होगा।
पुष्कर ने यह शर्त मान ली और नेहा उनके पास वापस आ गई। वह आस्तिक के साथ मालिनी के बच्चों को भी लेकर आई। पुष्कर ने दुनिया के सामने मालिनी के बच्चों को अपना नाम दिया, क्योंकि वह नेहा के साथ अपने रिश्ते ख़राब नहीं करना चाहता था। और तब तो बिल्कुल भी नहीं, जब पुष्कर का अंडरवर्ल्ड में नाम बनता जा रहा था।
हालाँकि, नेहा ने मालिनी के बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी। जैसे-जैसे आस्तिक की परवरिश हुई, बिल्कुल उसी तरीके से मालिनी के बेटे चेतन और बेटी बेला की परवरिश भी हुई। नेहा ने उन दोनों को वही प्यार दिया जो आस्तिक को देती आई थीं।
हालाँकि, चेतन और बेला अच्छी तरह जानते थे कि वे पुष्कर की नाजायज़ औलाद हैं। पुष्कर ने भले ही दुनिया के सामने उन्हें अपना लिया था, लेकिन घर के अंदर वह उन दोनों को एक आँख नहीं सुहाते थे। उनके लिए बस आस्तिक ही उनका बेटा था और आगे चलकर अंडरवर्ल्ड का अगला डॉन भी वही बनेगा, जिसकी नींव आस्तिक ने अपने दम पर रखनी शुरू कर दी थी।



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