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kill the f****** bastard

आस्तिक का दूसरा घर… अरुणिमा चाहे जितना नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करे, लेकिन ये बात उसके दिल के एक कोने में परेशानी का कारण थी कि आस्तिक उसके साथ इस घर में नहीं रहता था। वह अपने दूसरे घर में रहता था… और वह भी किसी और के साथ।

आस्तिक और अरुणिमा बंगले से बाहर आ गए थे और गाड़ी के पास पहुँच गए, जहाँ ड्राइवर पहले से ही उनका इंतज़ार कर रहा था। आस्तिक ने खुद अपनी तरफ़ का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गया और ड्राइवर से बोला, "चलो तिवारी, हमें लेट हो रहा है।"

ड्राइवर तिवारी जी ने जल्दी से अपनी टोपी पहनी और "यस बॉस" कहते हुए गाड़ी की तरफ़ बढ़े। अरुणिमा के लिए तो ये बस एक सिग्नल जैसा था। वह चुपचाप उनके पीछे-पीछे चल रही थी। जैसे ही वह गाड़ी के पास पहुँची, तिवारी जी ने उसके लिए दूसरी तरफ़ का दरवाज़ा खोला। गाड़ी में बैठने से पहले उसने धीरे से "थैंक यू" कहा।

जैसे ही अरुणिमा गाड़ी में बैठी, उसने देखा कि आस्तिक अपने फ़ोन में बिज़ी है। कॉल आने से पहले वह किसी से मैसेज पर बात कर रहा था। लेकिन जैसे ही फ़ोन की रिंग बजी, उसने कॉल उठाकर कान पर लगा लिया। दूसरी तरफ़ से कुछ कहा गया, जिसे सुनकर आस्तिक के माथे पर बल पड़ गए।

"जान से मार दो उस रिपोर्टर को। वह मेरे काम में टांग अड़ाने की हिम्मत कैसे कर सकता है? क्या एक बार में तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आती या दोबारा समझाने की ज़रूरत है?" उसने गुस्से में कहा। "उस दो कौड़ी के रिपोर्टर की वजह से मैं अपने प्रोजेक्ट में नुकसान बर्दाश्त नहीं करूँगा। उसे रास्ते से हटा दो।"

सामने से कुछ कहा गया, और आस्तिक गुस्से में जोर से चिल्लाया, "Kill the fa**ng bastard!"

गुस्से में उसने फ़ोन गाड़ी के कोने में फेंक दिया, जो सीधा जाकर अरुणिमा के पैर से टकराया। अरुणिमा पहले ही आस्तिक के चिल्लाने से डरी हुई थी। जब फ़ोन उसके पैर पर लगा, तो उसने हल्के से दर्द को अपने होंठों तले दबा लिया। आस्तिक ने गुस्से में अरुणिमा की तरफ़ देखा, लेकिन अरुणिमा अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली और ना ही उसने उसकी तरफ़ अपना चेहरा घुमाया। आस्तिक खिड़की से बाहर देखने लगा। वैसे भी अरुणिमा की चोट से उसे कोई मतलब नहीं था।

अरुणिमा ने धीरे से अपना हाथ अपने पैरों के पास लाया और हल्के से अपनी एड़ी को रगड़ने लगी। उसने देखा कि आस्तिक का फ़ोन उसके पैरों के पास पड़ा हुआ है। धीरे से उसने फ़ोन उठाया और आस्तिक की तरफ़ बढ़ा दिया। आस्तिक ने तीखी नज़रों से अरुणिमा की तरफ़ देखा, लेकिन बिना कुछ कहे उसने फ़ोन को झटके से अरुणिमा के हाथ से छीन लिया। उसकी ठंडी निगाहें इतनी ख़तरनाक थीं कि अरुणिमा की रूह तक काँप गई।

अरुणिमा इतनी डर गई थी कि उसे लगने लगा कि आस्तिक गुस्से में उसे नुकसान पहुँचा देगा। हालाँकि, उसने कभी अरुणिमा को चोट नहीं पहुँचाई थी, लेकिन जो पहले कभी नहीं हुआ, वह ज़रूरी नहीं कि आगे भी ना हो। हर चीज़ की शुरुआत कभी ना कभी तो होती ही है।

फ़ोन फेंकने के बाद, आस्तिक ने गुस्से में सामने की सीट पर जोर से हाथ मारा, जिससे उसके हाथ पर हल्की खरोंच आ गई। अरुणिमा ने धीरे से अपने पर्स से फूलों के डिज़ाइन वाली रुमाल निकाली और आस्तिक की तरफ़ बढ़ा दी। आस्तिक ने अपनी ख़तरनाक निगाहें अरुणिमा पर गड़ा दीं।

उसने अरुणिमा की कलाई पकड़ ली और गुस्से में घूरते हुए कहा, "तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है क्या कि मैं गुस्से में हूँ? क्यों मुझसे उलझ रही हो? मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत नहीं है।"

"मैं… बस…" अरुणिमा अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। लेकिन आस्तिक ने उसकी कलाई को झटक दिया और गुस्से से उसकी तरफ़ उंगली करते हुए बोला, "कुछ भी करने की कोशिश मत करना। समझीं? मेरे सामने ज़्यादा स्मार्ट बनने की ज़रूरत नहीं है। तुम मेरी बीवी सिर्फ़ दुनिया के लिए हो। मुझ पर हक़ जताने की कोशिश भी मत करना। हम दोनों जानते हैं कि यह शादी सिर्फ़ दिखावा है। ना मैं इस शादी में रहना चाहता हूँ और ना ही तुम। लेकिन हम दोनों ही इसे ख़त्म नहीं कर सकते।"

आस्तिक के शब्दों ने अरुणिमा को पूरी तरह ख़ामोश कर दिया। उसकी बातों ने अरुणिमा को एहसास दिला दिया कि उसकी भावनाओं का कोई महत्व नहीं है। आज का दिन अरुणिमा के लिए शायद सबसे कड़वा था। आस्तिक पहले भी एक राक्षस था और अब भी एक पशु है।

आस्तिक गुस्से में भड़कते हुए बोला, "तुम दुनिया और मेरे परिवार के सामने मेरी बीवी हो, क्योंकि उन्हीं लोगों ने तुमसे मेरी शादी करवाई है। लेकिन मेरे लिए तुम सिर्फ़ मेरे घर में पड़ा हुआ एक फ़ालतू सामान हो। इससे ज़्यादा तुम मेरी लाइफ़ में कोई इम्पॉर्टेंस नहीं रखती, समझीं अरुणिमा?"

आस्तिक की बातों ने उसे अंदर तक तोड़कर रख दिया। यह एहसास कि वह उसके लिए सिर्फ़ एक बोझ है, अरुणिमा को कचोट रहा था। लेकिन आस्तिक हर बार उसे इस बात का एहसास ज़रूर करवाता कि वह उसके घर का एक फ़ालतू सामान से ज़्यादा कुछ नहीं है। अरुणिमा का दिल भारी हो गया था और आँखों में आँसू आने लगे थे, जिन्हें उसने बहुत मुश्किल से रोकने की कोशिश की।

वैसे तो उसने कई बार आस्तिक को गुस्से में चिल्लाते हुए देखा था। आस्तिक हमेशा कोशिश करता था कि वह जितना हो सके, अरुणिमा से दूर ही रहे। शादी के दूसरे दिन से ही आस्तिक ने अरुणिमा से कोई रिश्ता नहीं रखा था। अगर निगाहों से किसी को मारा जा सकता, तो शायद आस्तिक अब तक अरुणिमा को कई बार मार चुका होता। उसकी वह ख़तरनाक, नफ़रत से जलती निगाहें अरुणिमा को अंदर तक जला रही थीं।

अरुणिमा का दिल चीखने को कर रहा था, लेकिन तभी उसे आस्तिक की माँ के कहे शब्द याद आ गए। जब उन्होंने मुँह दिखाई के समय उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा था कि क्यों उन्होंने अरुणिमा को आस्तिक के लिए चुना। उस वक़्त उन्होंने अरुणिमा से एक वादा लिया था। लेकिन आज अरुणिमा को लग रहा था कि वह अपना वादा कभी पूरा नहीं कर पाएगी, क्योंकि सामने खड़ा यह इंसान इंसान नहीं बल्कि एक पशु है। जिसे बदलना नामुमकिन है।

शादी के पहले साल में अरुणिमा को आस्तिक के बारे में ज़्यादा कुछ मालूम नहीं हुआ। वह पूरे साल में मुश्किल से पाँच बार घर आया था। ज़्यादातर या तो ऑफ़िस में रहता, अपने अवैध कामों में व्यस्त रहता या फिर अपने दूसरे घर में समय बिताता। दोनों की दुनिया बिल्कुल अलग थी। वे दोनों कभी भी एक साथ बैठकर नॉर्मल कपल्स की तरह डिनर नहीं करते थे और ना ही किसी बात पर एक-दूसरे से सलाह लेते थे। अरुणिमा अभी भी यह सोचकर हैरान थी कि आस्तिक अब तक उसके साथ क्यों है।

अपने ख़यालों में खोई अरुणिमा पर आस्तिक का गुस्सा अभी भी हावी था। वह भड़कते हुए बोला, "अपने छोटे से दिमाग में अच्छी तरह बैठा लो। जब मैं गुस्से में रहूँ, तो मेरे सामने आने की हिम्मत मत करना। पहले ही मैं अपने डील की वजह से परेशान हूँ, ऊपर से उस बेवकूफ़ रिपोर्टर ने मेरा दिमाग़ ख़राब कर दिया है। और तुम हो, जो मुझे परेशान करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती। चुपचाप गाड़ी के उस कोने में पड़ी रहो। तुम्हारी मौजूदगी का एहसास भी मुझे ना हो। समझीं?"

अरुणिमा ने डरते हुए हाँ में सिर हिलाया, तो आस्तिक ने उससे चेहरा फेर लिया और खिड़की की तरफ़ देखने लगा। गाड़ी की पिछली सीट पर गहरा सन्नाटा छा गया।

रायचंद मेंशन पहुँचने में उन्हें करीब आधे घंटे का समय लगा। यह हवेली शहर के बाहरी इलाके में थी। अरुणिमा इस हवेली में शादी के बाद सिर्फ़ अपनी रिसेप्शन पार्टी के लिए आई थी। उसी दिन उसने अपने माता-पिता को आखिरी बार देखा था, क्योंकि उसके बाद वे बैंगलोर शिफ्ट हो गए थे।

जैसे ही गाड़ी हवेली के गेट पर पहुँची, आस्तिक गाड़ी से उतरकर सीधे अंदर चला गया। उसने ना तो अरुणिमा के गाड़ी से उतरने का इंतज़ार किया और ना ही उसके साथ चलने की परवाह की। अरुणिमा ने गहरी साँस ली और धीरे से गाड़ी के पास खड़ी हो गई। यह सब उसके लिए बस एक औपचारिकता थी।

सब कुछ हमेशा की तरह ही होने वाला था। बस कुछ घंटे इस पार्टी में एक-दूसरे को बर्दाश्त करना था। उसके बाद अरुणिमा वापस अपने बंगले चली जाएगी और आस्तिक अपने दूसरे घर। वे फिर कब मिलेंगे, यह शायद वे दोनों भी नहीं जानते थे। जैसा पिछले एक साल से चल रहा था, वैसा ही चलता रहेगा।

अरुणिमा को जॉब करने की इजाज़त नहीं थी। यह इसलिए नहीं कि उसमें काबिलियत नहीं थी, बल्कि इसलिए क्योंकि किसी ने उसकी काबिलियत को समझा ही नहीं। आस्तिक ने उसे एक गोल्डन कार्ड दे रखा था। उसका मानना था कि लड़कियाँ काम करने के लिए नहीं होती हैं।

अरुणिमा ने एक बार आस्तिक को अपनी फ़ाइल दिखाई थी, जिसमें उसने इतिहास पर रिसर्च की थी। लेकिन आस्तिक ने उसे तुरंत रिजेक्ट कर दिया और उसका मज़ाक उड़ाते हुए उसे बच्चों के नर्सरी होमवर्क से कंपेयर कर दिया।

अरुणिमा पार्टी के एंट्रेंस पर खड़ी थी। आस्तिक अकेले ही अंदर चला गया था, और अरुणिमा अभी भी वहीं खड़ी थी। उसके दिमाग़ में बहुत सारी बातें चल रही थीं। तभी उसकी तरफ़ एक हाथ बढ़ता है। वह चौंक जाती है और अपना चेहरा उठाकर देखती है। सामने आस्तिक खड़ा था। उसने धीरे से अपना हाथ फोल्ड करते हुए अपनी बाजू अरुणिमा की तरफ़ बढ़ाई और इशारा किया। अरुणिमा उसका इशारा समझ गई और उसने धीरे से अपनी बाजू आस्तिक की बाजू में फँसा ली। दोनों एकदम परफेक्ट कपल की तरह खड़े हो गए।

लेकिन पार्टी हॉल में जाने से पहले, आस्तिक ने अरुणिमा की तरफ़ देखते हुए कहा, "तुम जानती हो ना कि मुझे क्या करना है?"

अरुणिमा धीरे से आस्तिक की तरफ़ देखकर अपना चेहरा हिलाती है। आस्तिक तीखी नज़रों से उसे देखते हुए कहता है, "अगर जानती हो, तो मुस्कुराओ। दिखने में तुम ख़ूबसूरत हो। मुस्कुराओगी तो तुम्हारे चेहरे पर यह जो परेशानी है, यह लोगों को नज़र नहीं आएगी। इसलिए एक अच्छी बीवी की तरह बिहेव करो और मुस्कुराते हुए मेरे साथ पार्टी में चलो।"

आस्तिक के ये शब्द अरुणिमा के दिल में चुभ रहे थे। उसने धीरे से अपने होंठ भींच लिए और जबरदस्ती अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान ले आई।

आस्तिक और अरुणिमा पार्टी में एंटर करते हैं। लेकिन दरवाज़े पर पहुँचते ही, आस्तिक को पीछे से एक आवाज़ सुनाई देती है।

"आस्तिक, तुम आ गए। हम तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे।"

आस्तिक ने अपना चेहरा घुमाया। अरुणिमा ने भी इस आवाज़ की तरफ़ देखा। सामने उम्रदराज़ कपल खड़ा था। उनके चेहरे पर मुस्कान थी। अरुणिमा ने भी अपने चेहरे पर एक नकली मुस्कान ओढ़ ली।

आस्तिक ने उन्हें पहचान लिया और उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। वह कपल भी अब तक आस्तिक के पास आ गया था। उस आदमी ने आस्तिक से हाथ मिलाते हुए कहा, "कैसे हो? और शादी की पहली सालगिरह बहुत-बहुत मुबारक हो।"

उस आदमी के साथ खड़ी उनकी वाइफ़ ने भी आस्तिक और अरुणिमा को देखते हुए कहा, "आप दोनों को शादी की पहली सालगिरह मुबारक हो।"

आस्तिक और अरुणिमा दोनों के चेहरे पर फ़ॉर्मेलिटी वाली मुस्कान थी। आस्तिक ने मुस्कुराते हुए "थैंक यू" कहा, और अरुणिमा ने भी धीरे से सिर हिलाया। ये दोनों आस्तिक के पिता के बिज़नेस पार्टनर थे, मिस्टर और मिसेज़ जरीवाला।

उनसे मिलने के बाद, आस्तिक और अरुणिमा हॉल में आते हैं, जहाँ पर पार्टी के लिए सब लोग मौजूद थे। जैसे-जैसे अरुणिमा पार्टी में अंदर बढ़ रही थी, उसकी घबराहट भी बढ़ती जा रही थी। दरअसल, अरुणिमा को लोगों के साथ ज़्यादा खुलकर मिलना पसंद नहीं था। उसकी घबराहट तब और बढ़ जाती थी, जब वह किसी पार्टी में सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन बन जाती थी। उसे लोगों की नज़रें अपने ऊपर अच्छी नहीं लगती थीं।

पार्टी हॉल बहुत ख़ूबसूरती से सजाया गया था। लाइट्स, झूमर और चमकीले कैंडल्स के साथ इस पार्टी को एक आलीशान पार्टी का रूप दिया गया था।

आस्तिक और अरुणिमा पार्टी हॉल में एंटर हो चुके थे, और जो भी उन्हें देख रहा था, उन्हें सालगिरह की बधाई दे रहा था।

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Deepika Sarkar

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