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उसके हाथों की कठपुतली

Mem, बॉस का मैसेज आया है। आज रात की पार्टी के लिए उन्होंने आपको रेडी होने के लिए कहा है; वो आपको लेने के लिए आ रहे हैं।

एक सर्वेंट अरुणिमा के पास आकर यह खबर देता है। अरुणिमा उस समय बगीचे में बैठी हुई थी, पर सर्वेंट की बात सुनकर उसे ज़्यादा हैरानी नहीं हुई। यह बात तो उसे पहले से ही पता थी। आज उसकी शादी की सालगिरह है। बाकी लड़कियों के लिए यह दिन खास होता होगा, लेकिन अरुणिमा के लिए आज का दिन कोई खास नहीं था। ना कोई खुशी, ना कोई एक्साइटमेंट। वह बस यही सोच रही थी कि उसे और कितना वक्त इस बेमतलब की शादी में रहना है।

अरुणिमा ने सामने खिलते हुए फूलों को देखते हुए अपने मन में कहा,

"आज मेरी और आस्तिक की शादी को पूरा 1 साल हो गया है। हर पत्नी के लिए यह दिन खास होता है, लेकिन मेरे लिए नहीं। यह शादी मेरे लिए बस एक समझौता था, जो दोनों परिवारों को खुश रखने के लिए मैं निभा रही हूँ। इस शादी में ना तो मैं रहना चाहती हूँ और आस्तिक... वह तो पहले दिन से ही इस शादी में नहीं रहना चाहते थे।"

"मैडम..."

पीछे खड़े नौकर ने अरुणिमा का ध्यान तोड़ा। अरुणिमा जल्दी से अपने ख्यालों से बाहर आती है और नौकर को हाथ के इशारे से जाने के लिए कहती है। नौकर वहाँ से चला जाता है। थोड़ी देर और गार्डन में टहलने के बाद अरुणिमा ने वहाँ लगे फूलों का एक खूबसूरत सा बंच तैयार किया और उसे लेकर कुछ देर और गार्डन में टहलने लगी। दोपहर की धूप में ठंडी-ठंडी हवाओं के बीच अरुणिमा काफी राहत महसूस कर रही थी। लेकिन इस वक्त भी उसके दिमाग में यही बातें चल रही थीं—1 साल उसने जहाँ गुजारे थे और जिन लोगों के बीच थी, उनके बारे में सोचते हुए वह कहती है,

क्या किस्मत है मेरी! मैं इस शहर के सबसे बड़े अंडरवर्ल्ड परिवार की बहू हूँ। रायचंद फैमिली—जिनका नाम लेने से पहले भी लोग 100 बार सोचते हैं। मैं उस परिवार के बड़े बेटे की बीवी हूँ, आस्तिक रायचंद, जो पूरे देश में अपने परिवार और कंपनी के अलावा माफिया के काले कारोबार का इकलौता मालिक है।

मैंने बचपन से ही अपने पापा को अंडरवर्ल्ड और माफिया के साथ मिलते हुए देखा था। और एक बार के लिए सोचा भी था कि इस दुनिया में आकर इसे करीब से जानूंगी। लेकिन यहाँ कदम रखने का सपना मैंने देव के साथ देखा था। आस्तिक तो मेरे सपनों की परछाई में भी नहीं थे। पर देखो मेरी किस्मत! आस्तिक माफिया का किंग है और मैं माफिया की लेडी क्वीन। लेकिन मुझे देखकर कोई नहीं कहेगा कि मैं इस जगह को डिजर्व भी करती हूँ या नहीं।

1 साल बीत गया और मेरी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। आस्तिक हमेशा की तरह मुझसे दूर हैं। और हमेशा की तरह मुझे पता है कि ना तो उन्हें शादी में कोई दिलचस्पी है और ना ही मुझमें। मतलब की शादी में तो मैं भी नहीं रहना चाहती थी। लेकिन फिर भी मैं आस्तिक से थोड़ी-सी इज्जत और सम्मान की उम्मीद तो कर सकती हूँ। पर उन्होंने मेरी इस उम्मीद पर शादी की पहली रात ही पानी फेर दिया था।

वह याद करती है कि शादी की पहली रात आस्तिक ने उससे कहा था:"चाहे अच्छी हो या बुरी, तुम्हें मेरी हर बात माननी होगी।"

और पिछले 1 साल से अरुणिमा उनकी हर बात मानती आ रही है, जैसे किसी कठपुतली की तरह।

सोचा तो कई बार था कि आस्तिक से अलग हो जाऊँ, लेकिन मैंने अपने पापा से वादा किया था कि मैं इस शादी को निभाऊँगी। और उनके किए वादे के चलते मैं आज तक इस शादी को निभा रही हूँ। लेकिन दिल के किसी कोने में उम्मीद है कि अगर मैं इस शादी में नहीं रहना चाहती, तो आस्तिक भी तो जबरदस्ती ही इसे निभा रहे हैं। वह सामने से तलाक क्यों नहीं मांग लेते? अगर उन्होंने तलाक माँगा, तो मैं खुशी-खुशी उनसे अलग हो जाऊँगी। इससे बड़ा तोहफा मेरे लिए और कुछ नहीं हो सकता।

शुरुआत में लगा था कि आस्तिक जल्दी ही तलाक दे देंगे। लेकिन उनके इरादे कहीं से भी मुझे ऐसा नहीं लगते। मैं हमेशा सोचती हूँ कि जब वह मुझसे शादी करके खुश नहीं हैं, तो मुझे तलाक क्यों नहीं दे देते? लेकिन कभी यह सवाल उनसे पूछने की हिम्मत नहीं हुई।

अपने ख्यालों में डूबी हुई अरुणिमा आखिरकार अपने हाथों से बनाए हुए फूलों के बंच को लेकर बंगले के अंदर आ जाती है। जैसे ही वह घर के अंदर दाखिल होती है, वहाँ दो नौकरानियां पहले से ही मौजूद थीं। ये अरुणिमा की पर्सनल नौकरानियां हैं—रोज़ी और जूली।

जूली वही नौकरानी है, जो गार्डन में अरुणिमा को आस्तिक के मैसेज के बारे में बताने आई थी। और रोज़ी, अरुणिमा की हर ज़रूरत का ख्याल रखती है। जैसे ही अरुणिमा हवेली में पहुँचती है, वे दोनों नौकरानियां उसके पास सर झुकाए हुए खड़ी थीं। अरुणिमा को पता था कि आस्तिक का मैसेज मिलने के बाद वे दोनों यहाँ क्यों खड़ी हैं। दरअसल, वे दोनों अरुणिमा को तैयार करने के लिए वहाँ खड़ी थीं, ताकि शाम को अरुणिमा अपने ससुराल जा सके। शादी की पहली सालगिरह की पार्टी वहीं पर है।

अरुणिमा ने अपने हाथों से बनाया हुआ फूलों का बंच एक फूलदान में लगाया और उसे प्यार से देखने लगी। घर की सजावट और डेकोरेशन के अलावा उसके पास और कोई काम ही नहीं था।

जैसे-जैसे वह सीढ़ियों पर चढ़ रही थी, वैसे-वैसे ही नौकरानियाँ जूली और रोज़ी उसके पीछे-पीछे आ रही थीं। ऊपर की मंज़िल पर पहुँचकर अरुणिमा आस्तिक के कमरे के सामने से गुज़री। हाँ, यह आस्तिक का कमरा था। अरुणिमा और आस्तिक ने आज तक अपना कमरा शेयर नहीं किया था। पूरी हवेली में सिर्फ़ अरुणिमा का अपना कमरा ही था, जहाँ उसे सुकून मिलता था। बाकी पूरे घर पर सिर्फ़ आस्तिक की मर्ज़ी चलती थी।

जैसे ही अरुणिमा अपने कमरे में पहुँची, उसने देखा कि उसके बेड पर एक बड़ा-सा गिफ्ट बॉक्स रखा हुआ है।

रोज़ी, अरुणिमा के पास आते हुए बोली, "मैडम, मैं आपके नहाने के लिए बाथटब में पानी भर देती हूँ।" लेकिन अरुणिमा का पूरा ध्यान इस वक्त गिफ्ट बॉक्स पर था। उसने रोज़ी की बात सुनी भी नहीं।

धीरे-धीरे वह बॉक्स के पास गई और उसे खोलने लगी। जैसे ही उसने बॉक्स खोला, उसकी आँखें हल्की-सी छोटी हो गईं। क्योंकि उसके अंदर ब्लैक कलर की डायमंड वर्क वाली शिफॉन साड़ी रखी हुई थी।

जैसे ही अरुणिमा ने साड़ी को हाथ में उठाया, जूली जल्दी से बोल पड़ी, "मैडम, यह तो बहुत खूबसूरत साड़ी है। आप इसमें बहुत सुंदर लगेंगी।"

साड़ी सच में बहुत खूबसूरत थी। उसमें किया गया डायमंड का काम असली डायमंड का था। पैसों के मामले में आस्तिक बहुत अमीर था, और उसका परिवार इस शहर का सबसे अमीर परिवार था। ऐसे में अपनी बीवी को डायमंड की साड़ी देना कोई बड़ी बात नहीं थी। अरुणिमा के पास ऐसे कई महँगे और डिज़ाइनर कपड़े थे। कुछ तो ऐसे थे जो उसने बिना पहने ही नौकरों को दे दिए थे।

लेकिन साड़ी के बाद जब अरुणिमा ने ब्लाउज को हाथ में उठाया, तो उसकी आँखें बड़ी हो गईं और चेहरे पर हल्का गुस्सा आ गया। यह ब्लाउज इस साड़ी के साथ का था, लेकिन यह बैकलेस था। या यूँ कहें, कंधे पर बस डोरी बँधी हुई थी। और इसका गला इतना डीप था कि क्लीवेज अच्छे से एक्सपोज़ हो सकता था।

अरुणिमा को गुस्सा आ रहा था, लेकिन उसने अपने गुस्से को संभाल लिया। हालाँकि, गुस्से की वजह से उसका शरीर काँप रहा था।

रोज़ी भी तब तक वॉशरूम से बाहर आ गई थी और जूली के पास आकर खड़ी हो गई। अरुणिमा ने ब्लाउज को हाथ में कसते हुए कहा, "तुम दोनों कमरे से बाहर जाओ।"

"लेकिन मैडम, हमें आपको तैयार..." जूली ने इतना ही कहा था कि अरुणिमा ने ऊँची आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा, "मैंने कहा ना, बाहर जाओ!"

वे दोनों अपना चेहरा झुकाकर कमरे से बाहर चली गईं। अरुणिमा ने ब्लाउज को बहुत कसकर अपने हाथ में पकड़ा हुआ था। उसका बस चलता तो इस वक्त इस ब्लाउज के टुकड़े-टुकड़े कर देती। उसे ऐसा लग रहा था जैसे यह उसकी बेइज्जती है। उसकी पूरी ज़िंदगी को कंट्रोल किया गया है। उसे क्या पहनना है और कैसे पहनना है, यह तक उससे कभी पूछा नहीं गया। ना तो आस्तिक ने कभी उसका सम्मान किया और ना ही उसकी मर्ज़ी के बारे में जानने की कोशिश की। उसने तो हमेशा अरुणिमा पर अपना ऑर्डर ही चलाया।

अरुणिमा का मन रोने का कर रहा था, पर वह रो नहीं सकती थी। क्योंकि इस वक्त उसे तैयार होना था। आस्तिक अगले आधे घंटे में घर पहुँचने वाला था, और उसके घर पहुँचने से पहले उसे तैयार होना था। आस्तिक ने पहले ही बता दिया था कि वह आ रहा है। ऐसे में अगर अरुणिमा तैयार नहीं होगी, तो आस्तिक बहुत नाराज़ हो जाएगा। इसी वजह से वह समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी। उसने जल्दी से साड़ी और ब्लाउज उठाया और बाथरूम में चली गई।

रोज़ी ने पहले से ही नहाने का सारा इंतज़ाम कर रखा था। इसीलिए अरुणिमा को ज़्यादा समय नहीं लगा। नहाकर जब अरुणिमा सिर्फ़ ब्लाउज और बॉडी शेपर में बाहर आई, तब तक रोज़ी और जूली भी कमरे में वापस आ गई थीं, ताकि वे अरुणिमा को आज रात की पार्टी के लिए तैयार कर सकें।

धीरे-धीरे अरुणिमा ने साड़ी पहनी। रोज़ी उसके बाल बना रही थी और जूली उसकी साड़ी की प्लेट्स ठीक कर रही थी।

सब कुछ तैयार होने के बाद, जूली ने बड़े बॉक्स के पास रखे एक छोटे बॉक्स से डायमंड का सेट निकाला। यह सेट अरुणिमा की साड़ी के साथ बिल्कुल मैच कर रहा था। जूली ने अरुणिमा की गले में डायमंड का हार पहना दिया, और रोज़ी ने उसके कानों में डायमंड की बालियाँ पहना दीं। इसके बाद अरुणिमा ने ड्रेसिंग टेबल से सिंदूर का डिब्बा उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे, और नज़रें सिंदूर पर टिकी हुई थीं।

हर बार जब वह अपनी मांग भरती थी, तो उसका दिल जोरों से धड़कने लगता था। हालाँकि, आस्तिक ने कभी उसके श्रृंगार पर ध्यान नहीं दिया। वह सिंदूर लगाए, मंगलसूत्र पहने या न पहने, चूड़ियाँ पहने या न पहने, आस्तिक ने उसे कभी गौर से नहीं देखा। लेकिन आज, जब उसे सबके सामने जाना था, तो यह करना ज़रूरी था। वरना अकेले में अरुणिमा कभी सिंदूर या सुहाग का कोई और सामान इस्तेमाल नहीं करती थी।

काफी देर तक सोचने और खुद को हिम्मत देने के बाद, आखिरकार अरुणिमा ने एक चुटकी सिंदूर उठाया और अपनी मांग भर ली। ऐसा लग रहा था, जैसे उसका अधूरा श्रृंगार सिंदूर के साथ पूरा हो गया हो। वैसे तो अरुणिमा बेहद खूबसूरत थी, लेकिन एक चुटकी सिंदूर में उसकी खूबसूरती और भी ज़्यादा बढ़ गई थी। मगर वह इस खूबसूरती के पीछे की अधूरी सच्चाई को महसूस कर रही थी।

जूली ने उसके बालों को प्रेसिंग मशीन से सीधा कर दिया, और रोज़ी उसके पैरों में हील्स पहनवा रही थी। अरुणिमा ने खुद को आइने में देखा। वह बिल्कुल परफेक्ट लग रही थी, बिल्कुल वैसी जैसी रायचंद खानदान की बहू को लगना चाहिए।

अरुणिमा खुद को देखने में मग्न थी, तभी गाड़ी की आवाज उसके कानों में पड़ी। उसका पूरा शरीर तनाव में आ गया। उसे पता था कि गाड़ी किसकी है। बंगले के अंदर गाड़ी की तीन बार हॉर्न की आवाज सुनाई दी। यह पहली बार नहीं था। हर बार उसे इसी तरह सिग्नल मिलता था कि आस्तिक की गाड़ी आ गई है।

आस्तिक की गाड़ी बंगले में इंटर कर चुकी थी। ड्राइवर तिवारी ने तीन बार हॉर्न बजाकर अरुणिमा को इशारा दिया था। तिवारी जी काफी बुज़ुर्ग थे और सालों से आस्तिक के लिए काम कर रहे थे। अरुणिमा का स्वभाव उनसे अलग था। जब उसने पहली बार तिवारी जी को ‘भैया’ कहा था, तो उन्हें लगा था कि वह बाकी अमीर लड़कियों से अलग है। शायद इसीलिए उन्होंने उसे सिग्नल देने के लिए गाड़ी का हॉर्न बजाना शुरू किया था।

आस्तिक के घर आने के साथ ही पूरे बंगले का माहौल अचानक से तनावग्रस्त हो गया। अरुणिमा ने तुरंत जूली और रोज़ी को कमरे से बाहर भेज दिया। फिर उसने बिस्तर की चादर ठीक की और फूल सही किए। अपना फोन बैग में रखा और शीशे में खुद को एक बार फिर से देखा। जब उसे लगा कि वह बिल्कुल ठीक लग रही है, तो उसने इंतज़ार करना शुरू कर दिया।

शाम हो चुकी थी। खिड़की से सूरज डूबता दिख रहा था, और रात धीरे-धीरे फैलने लगी थी। पिछले एक साल से उसका जीवन ऐसा ही था।

अरुणिमा घबराते हुए बिस्तर के पास खड़ी थी, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने गहरी साँस ली। एक नौकर ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा, "मैडम, आपको नीचे बुलाया जा रहा है।"

डरी हुई अरुणिमा ने खुद को संभालते हुए कदम बढ़ाए। उसने सोचा, "यह वही पल है जिसका मुझे इंतज़ार करना है।" आदर्श पत्नी की तरह उसने खुद को पेश किया और कमरे से बाहर निकली।

सीढ़ियों के पास पहुँचकर अरुणिमा ने अपना चेहरा नीचे कर लिया। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि हॉल की तरफ़ देखे। लेकिन जब उसने हल्का सा सिर उठाया, तो देखा आस्तिक सोफ़े के पास खड़ा था। वह वही आदमी था जिसने कभी अरुणिमा की परवाह नहीं की। अरुणिमा सोच रही थी, "इसने मुझसे शादी के लिए हाँ क्यों कहा था? मेरे पास इसके साथ शादी करने की वजह मेरे माता-पिता थे। पर इसके पास तो ऐसी कोई वजह नहीं थी। फिर भी, इसने मुझसे शादी क्यों की?"

अरुणिमा धीरे-धीरे आस्तिक की तरफ़ बढ़ने लगी। आस्तिक ने ब्लैक कलर का बिज़नेस सूट पहना हुआ था। पीछे से ही उसकी पर्सनालिटी बेहद चार्मिंग लग रही थी। जैसे ही अरुणिमा उसके पास पहुँची, आस्तिक ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। उनकी नज़रें आपस में टकरा गईं।

अरुणिमा का चेहरा खूबसूरत और चमक रहा था, लेकिन आस्तिक के चेहरे पर कोई मुस्कान या भाव नहीं था। हमेशा की तरह उसका चेहरा एक्सप्रेशनलेस था। अरुणिमा को याद आया कि उसने आस्तिक को बस एक बार मुस्कुराते हुए देखा था, वह भी शादी के दिन। तब भी, वह मुस्कान सिर्फ़ रिश्तेदारों और मीडिया के लिए थी। शादी के बाद, उसने कभी आस्तिक को मुस्कुराते नहीं देखा था।

आस्तिक ने घड़ी में समय देखा और फिर अरुणिमा की तरफ़ देखा। उसकी भूरी आँखें अरुणिमा पर टिक गई थीं। ब्लैक सूट में वह किसी ब्लैक डेविल से कम नहीं लग रहा था। चौड़ी छाती, बाइसेप्स और परफेक्ट बॉडी के साथ, उसकी पर्सनालिटी बेहद आकर्षक थी। लेकिन अरुणिमा को उसकी यह परफेक्शन कभी अपनापन महसूस नहीं करवा पाई।

जैसे ही आस्तिक ने अरुणिमा को देखा, उसके चेहरे पर ना तो मुस्कान आई और ना ही कोई रिएक्शन। उसका चेहरा बिल्कुल एक्सप्रेशनलेस था।

वैसे हमेशा से उसका चेहरा ऐसा नहीं था। अरुणिमा ने आस्तिक को मुस्कुराते हुए देखा था, बस शादी वाले दिन। वह भी सिर्फ़ थोड़ा सा और अरुणिमा को लगता था कि वह मुस्कान सिर्फ़ रिश्तेदारों, फैमिली और मीडिया के लिए थी, ताकि सबको लगे कि वह शादी से खुश है। वरना उसके बाद से आज तक, मुस्कुराना तो छोड़ो, उसने गलती से भी अपने होठों के किनारे तक नहीं हिलाए।

अरुणिमा ने उसे देखा तो वह पहले से तैयार होकर ही आया था। मतलब वह घर पर तैयार होने के लिए नहीं आया था। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी। आस्तिक काम के लिए ही घर आता था, क्योंकि वह ज्यादातर अपने दूसरे घर में रहता था। लेकिन अरुणिमा जानती थी कि वह दूसरे घर में अकेला नहीं रहता है।

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Deepika Sarkar

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