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Marriage with Beast

मैं अरुणिमा रायचंद और यह मेरी कहानी है।

मेरी शादी को एक साल हो चुका था, और मैं किसी की हो चुकी थी। "जब तक मौत हमें अलग न कर दे," मेरी पूरी ज़िंदगी किसी की हो गई थी। अब यही मेरी सच्चाई थी। मैं अब किसी की पत्नी थी। यह मेरा धर्म था, जिसे मुझे निभाना था। लेकिन क्या मैं खुश थी? नहीं, मैं खुश नहीं थी। मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। मेरे माता-पिता यही चाहते थे कि देव और मैं अलग हो जाएँ, और हम दोनों एक होने से पहले ही एक-दूसरे से बिछड़ गए थे।

मैं भले ही देव से दूर हो गई थी, लेकिन मेरा दिल कभी भी उससे दूर नहीं हुआ था।

आपको लगेगा कि मैं पागल हो गई हूँ, लेकिन मेरा दिल कभी देव से दूर नहीं गया। हालाँकि मुझे पता था कि उसने कभी भी मेरे लिए कोई भावना महसूस नहीं की थी। वह अपनी पत्नी मीरा और बच्चों के साथ खुशी-खुशी शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा था। मैंने यह भी सुना था कि उनके परिवार में सिर्फ़ इन दो सालों में दो और बच्चे हो गए थे। मैं उसके लिए खुश थी, लेकिन मेरा दिल भी टूटता था कि देव मेरा नहीं हो सका।

आप सबको पता है कि मैं देव से प्यार क्यों करती हूँ? क्योंकि वह प्यार करना जानता था। वह जानता था कि प्यार का क्या मतलब होता है और इसे कैसे निभाना चाहिए। पर अफ़सोस, उसकी भावनाएँ मेरे लिए नहीं थीं।

एक साल देव से दूरी और एक साल की शादी। दो साल बीत चुके थे। लेकिन मैं किसी और से प्यार कर ही नहीं सकी। मेरा दिल आज भी उसी के लिए धड़कता है। हालाँकि मैं जानती हूँ कि मैं बेवकूफ़ी कर रही हूँ। वह एक शादीशुदा इंसान है, और मेरी भी शादी हो चुकी है। ऐसे में उसके बारे में सोचना भी मेरे लिए पाप है।

वैसे, मेरी शादी मेरी मर्ज़ी से नहीं हुई थी। पर मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था। अपने परिवार के लिए मैंने इस शादी को स्वीकार ज़रूर कर लिया था, लेकिन देव को अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी। यह जानते हुए भी कि वह शादी करके अपनी बीवी के साथ बैंगलुरु में रह रहा है। मैंने आखिरी बार उससे फ़ोन पर बात की और......

खैर, छोड़ो। आगे बात करते हैं...

एक रात में ही मेरी पूरी ज़िंदगी बदल गई थी, क्योंकि मैं एक समझौते की शादी में थी। मेरा दिल इस कड़वाहट से भर गया था कि मेरे अपने परिवार ने मुझे एक सौदे की तरह इस्तेमाल किया था। मैं देव के साथ अपनी यादों से उबर भी नहीं पाई थी कि मेरे परिवार ने यह कहा कि उन्होंने मेरी शादी तय कर दी है।

मैं उस आदमी को जानती तक नहीं थी, लेकिन उन्होंने कहा कि उस इंसान ने मेरे परिवार के लिए बहुत कुछ किया है और हमारे ऊपर उसके कई एहसान हैं। वैसे, एहसान तो मेरे माता-पिता के भी मुझ पर थे। उन्होंने मुझे अनाथ आश्रम से गोद लिया था। हालाँकि उन्होंने मुझे इस बारे में कभी बताया नहीं था, लेकिन पापा की लाइब्रेरी में एक बार मुझे एडॉप्शन के दस्तावेज़ मिल गए थे। उन्हें पढ़कर ही मुझे पता चला था कि मैं उनकी गोद ली हुई बेटी हूँ।

मुझे लगा, अपने परिवार की मर्ज़ी से शादी करके मैं उनके इस एहसान का बदला चुका सकती हूँ। मेरी शादी उनके लिए एक फ़ायदे का सौदा भी थी। मैंने बचपन से ही अपने पिता को अंडरवर्ल्ड और माफ़िया के साथ ताल्लुक रखते हुए देखा था। मेरे पापा का माफ़िया और वहाँ से जुड़े हुए लोगों से अच्छे संबंध थे, ताकि लोग हमारे परिवार पर हमला न कर सकें। इसके अलावा, मेरे पापा का बिज़नेस भी बच रहा था।

जिस परिवार में मेरी शादी हुई थी, उनकी सिर्फ़ एक ही इच्छा थी कि उनकी बहू एक सिंपल और साधारण सी लड़की हो, जो ज़्यादा नकली न दिखे और जिसकी ज़्यादा ख्वाहिशें न हों। जाहिर सी बात है, मैं उनकी इस विचार पर खरी उतरी थी।

मुझे लगा था कि शादी करके मैं एक नई ज़िंदगी में कदम रखूँगी और अपने गुज़रे हुए कल को भूल जाऊँगी। जैसा कि मेरे परिवार ने बताया था, मेरा होने वाला पति एक अच्छा और नेकदिल इंसान है। उनके इसी भरोसे पर मैंने एक अनजान शख़्स से शादी कर ली। लेकिन शादी के बाद मुझे पता चला कि ये सारी बातें सिर्फ़ बातें ही थीं। एक अच्छा और नेकदिल इंसान तो दूर की बात है, मेरे पति को तो यह भी नहीं पता था कि किसी लड़की के साथ कैसे व्यवहार करना है। जो इंसान लड़कियों के साथ ठीक से पेश नहीं आ सकता, उससे प्यार की उम्मीद करना बेवकूफ़ी थी।

मुझे भी एक समय पर लगा था कि मेरा यह कदम मुझे मेरे टूटे हुए दिल से बाहर निकाल देगा, क्योंकि मुझे विश्वास था कि मेरे पति एक दयालु और समझदार इंसान होंगे। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि यह सच से बहुत दूर था। मेरे पति न नरम दिल थे, न दयालु, और न ही उन्हें पता था कि प्यार कैसे किया जाता है।

मुझे लगा था कि शादी के लिए सहमति देने का मतलब है उन्हें स्वीकार करना। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि वह एक स्वार्थी और ठंडे दिल का घमंडी इंसान है, जो सत्ता, पैसे और शारीरिक सुख के अलावा और कुछ जानते ही नहीं थे।

और इस तरह, मेरा दिल फिर कभी प्यार में न पड़ने के लिए बंद हो गया। मुझे लगता था कि मैं प्यार के लिए बनी ही नहीं थी। मेरे पति ने हमेशा मुझे मेरी महत्व और उनकी ज़िंदगी में मेरी "वैल्यू" के बारे में साफ़ कह दिया था। मैं उनके लिए सिर्फ़ उनके दर्जे को बनाए रखने का सामान हूँ। मतलब मैं उनकी बीवी तो हूँ लेकिन एक शोपीस की तरह।

हालाँकि, मेरे पति को प्यार करना नहीं आता था, लेकिन शरीर का इस्तेमाल करना बखूबी आता था। या यूँ कहें कि यह तो उनका शौक था। और उनका यह शौक मुझसे न सही तो किसी और से पूरा ज़रूर होता था। पहली बार दिल टूटने के बाद दोबारा प्यार करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी। लेकिन अपने सामने यह सब देखकर मुझे अपनी किस्मत पर अफ़सोस होने लगा। शायद मेरी किस्मत में प्यार था ही नहीं।

मैं उन सही लोगों में से थी जिनके लिए "प्यार" जैसा शब्द कभी बना ही नहीं था। मेरे पति ने हमेशा मुझे मेरी महत्ता और उनकी ज़िंदगी में मेरी "वैल्यू" के बारे में बताया। हाँ, उनकी लाइफ़ में मेरी वैल्यू थी, जब वे बहुत ज़्यादा तनाव में रहते थे। ऐसे वक़्त में उन्हें मेरी ज़रूरत पड़ती थी। मैं उनके लिए सिर्फ़ उनका तनाव दूर करने का ज़रिया थी। यही थी मेरी सच्चाई और मेरी शादीशुदा ज़िंदगी का कड़वा सच।

एक साल में मुझे इन सबकी आदत भी हो गई थी। अब न तो मुझे किसी से कोई शिकायत थी और न ही किसी से कोई उम्मीद। मैं अरुणिमा रायचंद, अपनी डायरी का यह आखिरी पन्ना लिख रही हूँ। ये सारी बातें, जो मैं किसी और से नहीं कह सकती, इन्हें मैं इस कागज़ पर उतार देती हूँ ताकि अपने मन का कुछ बोझ हल्का कर सकूँ।

रात के 12 बज चुके हैं और आज मेरी शादी की पहली सालगिरह है। लेकिन मुझे उम्मीद है कि कल का दिन भी मेरे लिए कुछ ख़ास नहीं होगा। हमेशा की तरह मेरा पति मुझे फिर वही एहसास दिलाएगा कि मैं उसकी ज़िंदगी में कोई वैल्यू नहीं रखती हूँ।

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Deepika Sarkar

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मेरी कहानी को इतना प्यार देने के लिए दिल से धन्यवाद ❤️ अगर आपको ऐसी ही मजेदार, दिल छू लेने वाली और रोमांच से भरी कहानियां पसंद हैं, तो मुझे ज़रूर फॉलो करें। मैं आपके लिए हर बार कुछ नया, शानदार और यादगार लेकर आती रहूंगी ✨

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